Moksha Marg Prakashak-Gujarati (Devanagari transliteration).

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३१६ ][ मोक्षमार्गप्रकाशक
सम्यक्त्वादिरूप मोक्षना उपायनो पुरुषार्थ बने छे; तेथी मुख्यपणे तो तत्त्वनिर्णय करवामां
उपयोग लगाववानो पुरुषार्थ करवो. अने उपदेश पण ए ज पुरुषार्थ कराववा अर्थे आपीए
छीए. ए पुरुषार्थथी मोक्षना उपायनो पुरुषार्थ स्वयमेव थशे.
वळी तत्त्वनिर्णय न करवामां कांई कर्मनो तो दोष छे नहि पण तारो ज दोष छे.
तुं पोते तो महंत रहेवा इच्छे छे अने पोताना दोष कर्मादिकने लगावे छे! पण जिनआज्ञा
माने तो आवी अनीति संभवे नहि. तारे विषयकषायरूप ज रहेवुं छे माटे आवुं जूठ बोले
छे. जो मोक्षनी साची अभिलाषा होय तो तुं आवी युक्ति शामाटे बनावे? संसारना कार्योमां
पोताना पुरुषार्थथी सिद्धि थती न जाणे तोपण त्यां पुरुषार्थ वडे उद्यम कर्या करे छे, अने
अहीं पुरुषार्थ गुमावी बेसे छे, तेथी जणाय छे के
तुं मोक्षने देखादेखी उत्कृष्ट कहे छे,
पण तेनुं स्वरूप ओळखी तेने हितरूप जाणतो नथी. हितरूप जाणी जेनो उद्यम बने ते न
करे, ए असंभवित छे.
प्रश्नःतमे कह्युं ते सत्य छे. परंतु द्रव्यकर्मना उदयथी भावकर्म थाय छे
अने भावकर्मथी द्रव्यकर्मनो बंध थाय छे, वळी पाछां तेना उदयथी भावकर्म थाय छे,
ए ज प्रमाणे अनादिकाळथी परंपरा चाले छे, त्यां मोक्षनो उपाय केवी रीते थई शके?
उत्तरःकर्मनो बंध वा उदय सदाकाळ समान ज रह्या करे तो तो एम ज छे,
परंतु परिणामोना निमित्तथी पूर्वे बांधेलां कर्मोनुं पण उत्कर्षण, अपकर्षण अने संक्रमणादि थतां
तेनी शक्ति हीन
अधिक थाय छे, तेथी तेनो उदय पण मंदतीव्र थाय छे; तेना निमित्तथी
नवीन बंध पण मंदतीव्र थाय छे; तेथी संसारी जीवोने कर्मोदयना निमित्तथी कोई वेळा
ज्ञानादिक घणां प्रगट थाय छे, कोई वेळा थोडां प्रगट थाय छे; कोई वेळा रागादि मंद थाय
छे, कोई वेळा तीव्र थाय छे, ए प्रमाणे पलटना थया करे छे.
त्यां कदाचित् संज्ञीपंचेन्द्रिय पर्याप्तपर्याय पाम्यो त्यारे मनवडे विचार करवानी तेने
शक्ति प्रगट थई. वळी तेने कोई वेळा तीव्र रागादिक थाय छे तथा कोई वेळा मंद थाय
छे, हवे त्यां रागादिकनो तीव्र उदय थतां तो विषयकषायादिनां कार्योमां ज प्रवृत्ति थाय छे
तथा रागादिकनो मंद उदय थतां बहारथी उपदेशादिनुं निमित्त बने अने पोते पुरुषार्थ करीने
ते उपदेशादिकमां उपयोगने जोडे तो धर्मकार्योमां प्रवृत्ति थाय. तथा निमित्त न बने वा पोते
पुरुषार्थ न करे तो अन्य कार्योमां ज प्रवर्ते परंतु मंदरागादि सहित प्रवर्ते, एवा अवसरमां
उपदेश कार्यकारी छे.
विचारशक्ति रहित जे एकेंद्रियादिक छे तेने तो उपदेश समजवानुं ज्ञान ज नथी
तथा तीव्ररागादि सहित जीवोनो उपयोग उपदेशमां जोडातो नथी, माटे जे जीव विचारशक्ति
सहित होय तथा जेमने रागादिक मंद होय तेमने उपदेशना निमित्तथी धर्मनी प्राप्ति थई