Moksha Marg Prakashak-Gujarati (Devanagari transliteration).

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नवमो अधिकार ][ ३१७
जाय तो तेनुं भलुं थाय, अने ए ज अवसरमां पुरुषार्थ कार्यकारी छे.
एकेन्द्रियादिक तो धर्मकार्य करवाने समर्थ ज नथी एटले तेओ केवी रीते पुरुषार्थ
करे? तथा तीव्रकषायी पुरुषार्थ करे तो ते पापकार्यनो ज करे पण धर्मकार्यनो पुरुषार्थ थई
शके नहि.
माटे जे विचारशक्ति सहित होय तथा जेने रागादिक मंद होय ते जीव पुरुषार्थ वडे
उपदेशादिकना निमित्तथी तत्त्वनिर्णयादिकमां उपयोग लगावे तो तेनो उपयोग त्यां लागे, त्यारे
तेनुं भलुं थाय. जो आ अवसरमां पण तत्त्वनिर्णय करवानो पुरुषार्थ न करे, प्रमादथी काळ
गुमावे, अगर कां तो मंदरागादि सहित विषय
कषायोनां कार्योमां ज प्रवर्ते वा कां तो
व्यवहारधर्मकार्योमां प्रवर्ते तो अवसर तो चाल्यो जाय अने संसारमां ज परिभ्रमण रहे.
बीजुं, आ अवसरमां जीव जो पुरुषार्थ वडे तत्त्वनिर्णय करवामां उपयोग लगाववानो
अभ्यास राखे तो तेने विशुद्धता वधे छे अने तेथी कर्मोनी शक्ति हीन थाय छे, तथा केटलाक
काळमां आपोआप दर्शनमोहनो उपशम थतां तेने तत्त्वोमां यथावत् प्रतीति आवे छे. हवे आनुं
कर्तव्य तो तत्त्वनिर्णयनो अभ्यास ज छे अने तेनाथी ज दर्शनमोहनो उपशम तो स्वयं ज
थाय छे. एमां जीवनुं कर्तव्य कांई नथी.
वळी ए (दर्शनमोहनो उपशम) थतां जीवने सम्यग्दर्शन तो स्वयं थाय छे, अने
सम्यग्दर्शन थतां श्रद्धान तो आवुं थयुं के‘हुं आत्मा छुं, मारे रागादिक न करवा;’ परंतु
चारित्रमोहना उदयथी रागादिक थाय छे, त्यां तीव्र उदय थाय त्यारे तो ते विषयादिकमां प्रवर्ते
छे अने मंद उदय होय त्यारे पोताना पुरुषार्थथी धर्मकार्योमां वा वैराग्यादि भावनामां
उपयोगने लगावे छे, तेना निमित्तथी चारित्रमोह मंद थतो जाय छे. ए प्रमाणे थतां
देशचारित्र वा सकलचारित्र अंगीकार करवानो पुरुषार्थ प्रगट थाय छे. वळी चारित्र धारण
करी पोताना पुरुषार्थ वडे धर्ममां परिणतिने वधारे छे, त्यां विशुद्धता वडे कर्मनी शक्ति हीन
थाय छे तेथी विशुद्धता वधे छे ने तेथी कर्मनी शक्ति वधारे हीन थाय छे. ए प्रमाणे क्रमथी
मोहनो नाश करे त्यारे परिणाम सर्वथा विशुद्ध थाय छे, ते वडे ज्ञानावरणादिनो नाश थई
केवळज्ञान प्रगट थाय छे. त्यार पछी उपाय विना अघातिकर्मोनो पण नाश करीने शुद्ध
सिद्धपदने प्राप्त करे छे.
ए प्रमाणे उपदेशनुं तो निमित्त बने अने पोतानो पुरुषार्थ करे तो कर्मनो नाश थाय छे.
वळी ज्यारे कर्मनो उदय तीव्र होय त्यारे पुरुषार्थ थई शकतो नथी, उपरना
गुणस्थानेथी पण पडी जाय छे, त्यां तो जेवुं होनहार होय तेवुं थाय छे, परंतु ज्यां मंद
उदय होय अने पुरुषार्थ बनी शके त्यां तो प्रमादी न थवुं, सावधान थई पोतानुं कार्य करवुं.