३१८ ][ मोक्षमार्गप्रकाशक
जेम कोई पुरुष नदीना प्रवाहमां पड्यो वह्यो जतो होय, त्यां पाणीनुं जोर होय त्यारे
तो तेनो पुरुषार्थ कांई कामनो नथी, उपदेश पण कार्यकारी नथी. तथा पाणीनुं जोर थोडुं होय
त्यारे जो पुरुषार्थ करी नीकळवा इच्छे तो ते नीकळी शके छे, अने तेने ज नीकळवानी शिक्षा
आपीए छीए. छतां जो ते न नीकळे तो धीरे धीरे (प्रवाहे प्रवाहे) वहे, अने पाछळथी
पाणीनुं जोर थतां वह्यो चाल्यो जाय. ए ज प्रमाणे जीव संसारमां भ्रमण करे छे, त्यां कर्मोनो
तीव्र उदय होय त्यारे तो तेनो कांई पुरुषार्थ नथी, उपदेश पण कार्यकारी नथी, अने कर्मनो
मंद उदय होय त्यारे जो पुरुषार्थ करी मोक्षमार्गमां प्रवर्ते तो ते मोक्ष प्राप्त करी ले, अने
तेने ज मोक्षमार्गनो उपदेश दे छे. तथा ते मोक्षमार्गमां न प्रवर्ते तो किंचित् विशुद्धता पामी
पाछळथी तीव्र उदय आवतां निगोदादि पर्यायने प्राप्त करशे.
माटे आ अवसर चूकवो योग्य नथी. हवे सर्व प्रकारथी अवसर आव्यो छे,
आवो अवसर पामवो कठण छे, तेथी श्रीगुरु दयाळु थई मोक्षमार्गने उपदेशे, तेमां
भव्य जीवोए प्रवृत्ति करवी.
✾ मोक्षमार्गनुं स्वरुप ✾
हवे मोक्षमार्गनुं स्वरूप कहीए छीएः —
जेना निमित्तथी आत्मा अशुद्धदशा धारण करी दुःखी थयो छे एवां जे मोहादिकर्म
तेनो सर्वथा नाश थतां केवळ आत्मानी जे सर्व प्रकारथी शुद्ध अवस्था थवी ते मोक्ष छे, तथा
तेनो जे उपाय अर्थात् कारण ते मोक्षमार्ग जाणवो.
हवे कारण तो अनेक प्रकारनां होय छे. कोई कारण तो एवां होय छे के – जेना होवा
विना तो कार्य न थाय अने जेना होवाथी कार्य थाय वा न पण थाय; जेम – मुनिलिंग धारण
कर्या विना तो मोक्ष न थाय, परंतु मुनिलिंग धारण करवाथी मोक्ष थाय वा न पण थाय.
तथा केटलांक कारण एवां छे के – मुख्यपणे तो जेना होवाथी कार्य थाय छे परंतु कोईने ते
होवा विना पण कार्यसिद्धि थाय छे; जेम के – मुख्यपणे तो अनशनादि बाह्यतपनुं साधन करतां
मोक्ष थाय छे, परंतु भरतादिने बाह्यतप कर्या विना ज मोक्षनी प्राप्ति थई. तथा केटलाक कारण
एवां छे के – जेना होवाथी कार्यसिद्धि अवश्य थाय ज तथा जेना न होवाथी कार्यसिद्धि सर्वथा
न थाय; जेम – सम्यग्दर्शन – ज्ञानचारित्रनी एकतां थतां तो अवश्य मोक्ष थाय अने ए थया
विना सर्वथा मोक्ष न थाय. — ए प्रमाणे ए कारणो कह्यां तेमां अतिशयपूर्वक नियमथी मोक्षनो
साधक जे सम्यग्दर्शन – ज्ञान – चारित्रनो ऐक्यभाव ते मोक्षमार्ग जाणवो. ए सम्यग्दर्शन,
सम्यग्ज्ञान तथा सम्यक्चारित्रमांथी एक पण न होय तो मोक्षमार्ग थाय नहि.
श्री तत्त्वार्थसूत्रमां पण एम ज कह्युं छे, यथा – ‘सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः’
(अ. १. सूत्र १.)