नवमो अधिकार ][ ३१९
आ सूत्रनी टीकामां कह्युं छे के – अहीं ‘मोक्षमार्ग’ एवुं जे एकवचन कह्युं छे तेनो अर्थ
आ छे के ए त्रणे मळीने एक मोक्षमार्ग छे; जुदाजुदा त्रण मार्ग नथी.
प्रश्नः — असंयतसम्यग्द्रष्टिने तो चारित्र नथी; तो तेने मोक्षमार्ग थयो छे के
नथी थयो?
उत्तरः — मोक्षमार्ग तेने थशे ए तो नियम थयो; अने तेथी उपचारथी तेने मोक्षमार्ग
थयो पण कहीए छीए; परमार्थथी सम्यक्चारित्र थतां ज मोक्षमार्ग थाय छे. जेम कोई पुरुषने
कोई नगरमां जवानो निश्चय थयो तेथी तेने व्यवहारथी एम पण कहीए छीए के — ‘आ
अमुक नगर जाय छे,’ पण परमार्थथी मार्गमां गमन करतां ज चालवुं थशे; तेम
असंयतसम्यग्द्रष्टिने वीतरागभावरूप मोक्षमार्गनुं श्रद्धान थयुं छे तेथी तेने उपचारथी मोक्षमार्गी
कहीए छीए, पण परमार्थथी वीतरागभावरूप परिणमतां ज मोक्षमार्ग थशे. श्री प्रवचनसारमां
पण ए त्रणेनी एकाग्रता थतां ज मोक्षमार्ग कह्यो छे, माटे एम जाणवुं के — तत्त्वश्रद्धान –
ज्ञान विना तो रागादि घटाडवा छतां मोक्षमार्ग नथी तथा रागादि घटाड्या विना तत्त्वश्रद्धान –
ज्ञानथी पण मोक्षमार्ग नथी; ए त्रणे मळतां ज साक्षात् मोक्षमार्ग थाय छे.
हवे तेनुं निर्देश तथा लक्षणनिर्देश अने परीक्षा द्वारा निरूपण करीए छीए.
✾ लक्षण अने तेना दोष ✾
त्यां सम्यग्दर्शन – सम्यग्ज्ञान – सम्यक्चारित्र मोक्षनो मार्ग छे’ एवुं नाममात्र कथन करवुं
ते तो ‘निर्देश’ जाणवो.
तथा जे अतिव्याप्ति, अव्याप्ति अने असंभवपणावडे रहित होय के जेथी तेने
ओळखवामां आवे ते ‘लक्षण’ जाणवुं; तेनो जे निर्देश अर्थात् निरूपण ते ‘लक्षणनिर्देश’ जाणवो.
त्यां जेने ओळखवानुं होय तेनुं नाम लक्ष्य छे अने ते सिवाय अन्यनुं नाम अलक्ष्य
छे. हवे जे लक्ष्य वा अलक्ष्य बंनेमां होय एवुं लक्षण ज्यां कहेवामां आवे त्यां अतिव्याप्तिपणुं
जाणवुं; जेम आत्मानुं लक्षण ‘अमूर्तत्व’ कह्युं त्यां अमूर्तत्व लक्षण लक्ष्य ज आत्मा छे तेमां
पण होय छे तथा अलक्ष्य जे आकाशादि तेमां पण होय छे, माटे ए लक्षण अतिव्याप्तिदोष
सहित लक्षण छे. कारण के ए वडे आत्माने ओळखतां आकाशादि पण आत्मा थई जाय,
ए दोष आवे तथाः —
जे कोई लक्ष्यमां तो होय तथा कोईमां न होय, ए प्रमाणे लक्ष्यना एकदेशमां होय
एवुं लक्षण ज्यां कहेवामां आवे त्यां अव्याप्तिपणुं जाणवुं; जेम आत्मानुं लक्षण केवळज्ञानादिक
कहीए त्यां केवळज्ञान तो कोई आत्मामां होय छे त्यारे कोईमां नथी होतुं माटे ए लक्षण