३२० ][ मोक्षमार्गप्रकाशक
अव्याप्ति दोषसहित लक्षण छे, कारण के ए वडे आत्मा ओळखतां अल्पज्ञानी आत्मा न
ठरे, ए दोष आवे. तथा —
जे लक्ष्यमां होय ज नहि एवुं लक्षण ज्यां कहेवामां आवे त्यां असंभवपणुं जाणवुं;
जेम आत्मानुं लक्षण जडपणुं कहीए. ए प्रत्यक्षादि प्रमाणथी विरुद्ध छे कारण के ए असंभव
लक्षण छे, कारण के ए वडे आत्माने मानतां पुद्गलादि आत्मा थई जाय अने आत्मा छे
ते अनात्मा थई जाय — ए दोष आवे.
ए प्रमाणे जे अतिव्याप्ति, अव्याप्ति अने असंभवित लक्षण होय ते लक्षणाभास छे,
परंतु जे लक्षण लक्ष्यमां तो सर्वत्र होय अने अलक्ष्यमां कोई पण ठेकाणे न होय ते ज साचुं
लक्षण छे; जेम के — आत्मानुं स्वरूप (लक्षण) चैतन्य. हवे ए लक्षण बधाय आत्मामां तो
होय छे अने अनात्मामां कोई पण ठेकाणे होतुं नथी माटे ए साचुं लक्षण छे. ए वडे आत्मा
मानवाथी आत्मा अने अनात्मानुं यथार्थज्ञान थाय छे, कोई दोष आवतो नथी. ए प्रमाणे
लक्षणनुं स्वरूप उदाहरणमात्र कह्युं.
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सम्यग्दर्शनादिकनुं साचुं लक्षण ✾
हवे सम्यग्दर्शनादिकनुं साचुं लक्षण कहीए छीएः —
विपरीताभिनिवेशरहित जीवादितत्त्वार्थश्रद्धान सम्यग्दर्शननुं लक्षण छे. जीव, अजीव,
आस्रव, बंध, संवर, निर्जरा अने मोक्ष ए सात तत्त्वार्थ छे, एनुं जे श्रद्धान अर्थात् ‘आम
ज छे अन्यथा नथी’ एवो प्रतीतिभाव ते तत्त्वार्थश्रद्धान छे तथा विपरीताभिनिवेश जे अन्यथा
अभिप्राय तेथी जे रहित ते सम्यग्दर्शन छे.
अहीं विपरीताभिनिवेशना निराकरण अर्थे ‘सम्यक् ’ पद कह्युं छे, कारण ‘सम्यक्’ एवो
शब्द प्रशंसावाचक छे तेथी श्रद्धानमां विपरीताभिनिवेशनो अभाव थतां ज प्रशंसा संभवे छे,
एम जाणवुं.
प्रश्नः — अहीं ‘तत्त्व अने अर्थ’ ए बे पद कह्यां तेनुं शुं प्रयोजन?
उत्तरः — ‘तत्’ शब्द छे ते ‘यत्’ शब्दनी अपेक्षा सहित छे तेथी जेनुं प्रकरण होय
तेने ‘तत्’ कहीए अने जेनो जे भाव अर्थात् स्वरूप तेने तत्त्व जाणवुं; कारण के ‘तस्यभावस्तत्त्वं’
एवो तत्त्व शब्दनो समास थाय छे, तथा जाणवामां आवता एवा जे द्रव्य वा गुण – पर्याय
छे तेनुं नाम अर्थ छे. वळी ‘तत्त्वेन अर्थस्तत्त्वार्थः’ तत्त्व कहेतां पोतानुं स्वरूप, ए वडे सहित
पदार्थ तेनुं श्रद्धान, ते सम्यग्दर्शन छे. अहीं जो ‘तत्त्वश्रद्धान’ ज कहीए तो जेनो आ भाव
(तत्त्व) छे तेना श्रद्धान विना केवळ भावनुं ज श्रद्धान कार्यकारी नथी. तथा जो ‘अर्थश्रद्धान’
ज कहीए तो भावना श्रद्धान विना केवळ पदार्थश्रद्धान पण कार्यकारी नथी.