नवमो अधिकार ][ ३२१
जेम कोईने ज्ञान – दर्शनादिक वा वर्णादिकनुं तो श्रद्धान होय ते ‘आ जाणपणुं छे, आ
श्वेतवर्ण छे’ इत्यादि प्रतीति तो होय परंतु ज्ञान – दर्शन आत्मानो स्वभाव छे अने हुं आत्मा
छुं, तथा वर्णादिक पुद्गलनो स्वभाव छे अने पुद्गल माराथी भिन्न – जुदो पदार्थ छे – ए
प्रमाणे पदार्थनुं श्रद्धान न होय तो भावनुं श्रद्धान कार्यकारी नथी. वळी ‘हुं आत्मा छुं’ एवुं
श्रद्धान कर्युं पण आत्मानुं स्वरूप जेवुं छे तेवुं श्रद्धान न कर्युं, तो भावना श्रद्धान विना पदार्थनुं
श्रद्धान पण कार्यकारी नथी. माटे तत्त्वसहित अर्थनुं श्रद्धान होय ते ज कार्यकारी छे. अथवा
जीवादिकने तत्त्वसंज्ञा पण छे अने अर्थसंज्ञा पण छे तेथी ‘तत्त्वमेवार्थस्तत्त्वार्थः’ जे तत्त्व छे
ते ज अर्थ छे, तेनुं श्रद्धान ते सम्यग्दर्शन छे.
ए अर्थ वडे कोई ठेकाणे तत्त्वश्रद्धानने सम्यग्दर्शन कहेल छे, वा कोई ठेकाणे
पदार्थश्रद्धानने सम्यग्दर्शन कहेल छे. त्यां विरोध न जाणवो.
ए प्रमाणे ‘तत्त्व’ अने ‘अर्थ’ ए बे पद कहेवानुं प्रयोजन छे.
तत्त्व सात ज केम?
प्रश्नः — तत्त्वार्थ तो अनंत छे अने ते बधां सामान्य अपेक्षाए जीव – अजीवमां
गर्भित थाय छे माटे बे ज कहेवां हतां अथवा अनंत कहेवां हतां; आस्रवादि तो जीव –
अजीवनां ज विशेषो छे, तो तेमने जुदां जुदां कहेवानुं शुं प्रयोजन?
उत्तरः — जो अहीं पदार्थश्रद्धान करवानुं ज प्रयोजन होत तो सामान्यपणे वा
विशेषपणे जेम सर्व पदार्थोनुं जाणवुं थाय तेम ज कथन करत, पण ए प्रयोजन तो अहीं
छे नहि. अहीं तो मोक्षनुं प्रयोजन छे तेथी जे सामान्य वा विशेष भावोनुं श्रद्धान करतां
मोक्ष थाय तथा जेना श्रद्धान कर्या विना मोक्ष न थाय तेनुं ज निरूपण अहीं कर्युं.
जीव – अजीव ए बे तो घणां द्रव्योनी एकजाति अपेक्षाए सामान्यरूप तत्त्व कह्यां, ए
बंने जाति जाणतां आत्माने स्वपरनुं श्रद्धान थाय त्यारे परथी भिन्न पोताने जाणी पोताना
हितना अर्थे मोक्षनो उपाय करे तथा पोताथी भिन्न परने जाणे त्यारे परद्रव्यथी उदासीन
थई रागादिक छोडी मोक्षमार्गमां प्रवर्ते, तेथी ए बंने जातिनुं श्रद्धान थतां ज मोक्ष थाय;
पण ए बंने जाति जाण्या विना स्व – परनुं श्रद्धान न थवाथी पर्यायबुद्धिथी ते सांसारिक
प्रयोजननो ज उपाय करे, अने परद्रव्योमां राग – द्वेषरूप थई प्रवर्ततां ते मोक्षमार्गमां केवी रीते
प्रवर्ते? माटे ए बंने जातिनुं श्रद्धान न थतां मोक्ष पण न थाय. ए प्रमाणे ए बे सामान्य
तत्त्वो तो अवश्य श्रद्धान करवा योग्य कह्यां.
बीजुं, आस्रवादि पांच तत्त्वो कह्यां ते जीव – पुद्गलना ज पर्याय छे तेथी ए विशेषरूप
तत्त्वो छे. ए पांच पर्यायोने जाणतां मोक्षनो उपाय करवानुं श्रद्धान थाय.