Moksha Marg Prakashak-Gujarati (Devanagari transliteration).

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३२२ ][ मोक्षमार्गप्रकाशक
तेमां मोक्षने ओळखे तो तेने हितरूप मानी तेनो उपाय करे, तेथी मोक्षनुं श्रद्धान करवुं.
मोक्षनो उपाय संवर
निर्जरा छे तेने ओळखे तो जेम संवरनिर्जरा थाय तेम प्रवर्ते
माटे संवरनिर्जरानुं श्रद्धान करवुं.
वळी संवरनिर्जरा तो अभावलक्षणसहित छे तेथी जेनो अभाव करवानी जरूर छे
तेने ओळखवो जोईए. जेमकेक्रोधनो अभाव थतां क्षमा थाय, हवे क्रोधने ओळखे तो तेनो
अभाव फरी क्षमारूप प्रवर्ते. ए ज प्रमाणे आस्रवनो अभाव थतां संवर थाय तथा बंधनो
एकदेश अभाव थतां निर्जरा थाय, हवे आस्रव
बंधने ओळखे तो तेनो नाश करी संवर
निर्जरारूप प्रवर्ते, माटे आस्रवबंधनुं पण श्रद्धान करवुं.
ए प्रमाणे ए पांच पर्यायोनुं श्रद्धान थतां ज मोक्षमार्ग थाय. एने ओळखे तो ते
मोक्षने ओळखे, पण जो तेने न ओळखे तो मोक्षनी ओळखाण विना तेनो उपाय शा माटे
ए करे? संवर
निर्जरानी ओळखाण विना तेमां केवी रीते प्रवर्ते? आस्रवबंधनी ओळखाण
विना तेनो नाश केवी रीते करे? एम पांच पर्यायोनुं श्रद्धान न थवाथी मोक्षमार्ग न थाय.
एवी रीते जोके तत्त्वार्थ अनंत छे तेनुं सामान्यविशेषवडे अनेक प्रकारे प्ररूपण थाय
छे परंतु अहीं एक मोक्षनुं प्रयोजन छे माटे जाति अपेक्षाए बे तो सामान्य तत्त्व तथा
पर्यायरूप पांच विशेषतत्त्व मळी सात तत्त्व ज कह्यां.
कारण केएना यथार्थश्रद्धानने आधीन मोक्षमार्ग छे, ए विना अन्य पदार्थोनुं श्रद्धान
हो वा न हो अथवा अन्यथा हो, परंतु कोईने आधीन मोक्षमार्ग नथीएम जाणवुं.
वळी कोई ठेकाणे पुण्यपाप रहित नव पदार्थ कह्या छे, ए पुण्यपाप आस्रवादिकनां
ज भेदो छे माटे ए सात तत्त्वोमां गर्भित थया. अथवा पुण्यपापनुं श्रद्धान थतां पुण्यने
मोक्षमार्ग न माने वा स्वच्छंदी बनी पापरूप न प्रवर्ते तेथी मोक्षमार्गमां एनुं श्रद्धान पण
उपकारी जाणी ए बे तत्त्वो आस्रव विशेषमां मेळवी नव पदार्थ कह्या वा श्री समयसारादिमां
एने नव तत्त्व पण कह्यां छे.
प्रश्नःएनुं श्रद्धान सम्यग्दर्शन कह्युं, पण दर्शन तो सामान्य अवलोकनमात्र
छे तथा श्रद्धान प्रतीतिमात्र छे, तो एने एकार्थपणुं केवी रीते संभवे?
उत्तरःप्रकरणना वशथी धातुनो अर्थ बीजो पण थाय छे. मोक्षमार्गनुं प्रकरण छे
तेथी तेमां दर्शन शब्दनो अर्थ सामान्य अवलोकनमात्र ग्रहण करवो नहि; कारण के चक्षु
अचक्षुदर्शनवडे सामान्य अवलोकन तो सम्यग्द्रष्टि अने मिथ्याद्रष्टिने समान होय छे, तेथी ए
वडे कांई मोक्षमार्गनी प्रवृत्ति
अप्रवृत्ति थती नथी. तथा श्रद्धान होय छे ते सम्यग्द्रष्टिने ज
होय छे अने ए वडे मोक्षमार्गनी प्रवृत्ति थाय छे. माटे दर्शन शब्दनो अर्थ पण अहीं
श्रद्धानमात्र ज ग्रहण करवो.