नवमो अधिकार ][ ३२३
प्रश्नः — अहीं विपरीताभिनिवेशरहित श्रद्धान करवुं कह्युं तेनुं शुं प्रयोजन?
उत्तरः — अभिनिवेश नाम अभिप्रायनुं छे. जेवो तत्त्वार्थश्रद्धाननो अभिप्राय छे तेवो
नहि होतां अन्यथा अभिप्राय होय तेनुं नाम विपरीताभिनिवेश छे. तत्त्वार्थश्रद्धान करवानो
अभिप्राय केवळ तेनो निश्चय करवो एटलो ज मात्र नथी पण त्यां अभिप्राय एवो छे के
जीव – अजीवने ओळखी पोताने वा परने जेम छे तेम मानवा, आस्रवने ओळखी तेने
हेय मानवो, बंधने ओळखी तेने अहित मानवो, संवरने ओळखी तेने उपादेय
मानवो, निर्जराने ओळखी तेने हितनुं कारण मानवुं तथा मोक्षने ओळखी तेने
पोतानुं परमहित मानवुं. ए प्रमाणे तत्त्वार्थश्रद्धाननो अभिप्राय छे. तेनाथी उलटा
अभिप्रायनुं नाम विपरीताभिनिवेश छे. सत्य तत्त्वार्थश्रद्धान थतां तेनो अभाव थाय छे माटे
तत्त्वार्थश्रद्धान छे ते विपरीताभिनिवेशरहित छे, एम अहीं कह्युं छे.
अथवा कोईने आभासमात्र तत्त्वार्थश्रद्धान होय छे, परंतु अभिप्रायमांथी विपरीतपणुं
छूटतुं नथी. कोई प्रकारथी पूर्वोक्त अभिप्रायथी अन्यथा अभिप्राय अंतरंगमां होय तो तेने
सम्यग्दर्शन थाय नहि, जेम के — द्रव्यलिंगी मुनि जिनवचनथी तत्त्वोनी प्रतीति तो करे छे परंतु
शरीराश्रित क्रियाओमां अहंकार वा पुण्यास्रवमां उपादेयपणुं आदि विपरीत अभिप्रायथी ते
मिथ्याद्रष्टि ज रहे छे. माटे तत्त्वार्थश्रद्धान विपरीताभिनिवेशरहित छे ते ज सम्यग्दर्शन छे.
ए प्रमाणे विपरीताभिनिवेशरहित जीवादितत्त्वोनुं श्रद्धानपणुं ए ज सम्यग्दर्शननुं
लक्षण छे तथा सम्यग्दर्शन लक्ष्य छे.
तत्त्वार्थसूत्रमां पण ए ज कह्युं छे यथाः —
‘तत्त्वार्थश्रद्धानं सम्यग्दर्शनम्’ (अ. १. सूत्र २)
अर्थात् तत्त्वार्थोनुं श्रद्धान ए ज सम्यग्दर्शन छे.
सर्वार्थसिद्धि नामनी तत्त्वार्थसूत्रनी टीकामां तत्त्वादिक पदोनो अर्थ प्रगट लख्यो छे वा
‘सात ज तत्त्व केम कह्यां?’ तेनुं प्रयोजन लख्युं छे ते अनुसार अहीं कंईक कथन कर्युं छे,
एम जाणवुं.
वळी पुरुषार्थसिद्ध्युपायमां पण एम ज कह्युं छे, यथा —
जीवाजीवादीनां तत्त्वार्थानां सदैव कर्तव्यम् ।
श्रद्धानं विपरीताभिनिवेशविविक्तमात्मरूपं तत् ।।२२।।
अर्थः — विपरीताभिनिवेशथी रहित जीव – अजीवादि तत्त्वार्थोनुं श्रद्धान सदाकाळ करवा