३२४ ][ मोक्षमार्गप्रकाशक
योग्य छे. ए श्रद्धान आत्मानुं स्वरूप छे, दर्शनमोहरूप उपाधि दूर थतां प्रगट थाय छे माटे
आत्मानो स्वभाव छे. चतुर्थादि गुणस्थानमां प्रगट थाय छे, पछी सिद्धअवस्थामां पण
सदाकाळ तेनो सद्भाव रहे छे — एम जाणवुं.
तत्त्वार्थश्रद्धानलक्षणमां अव्याप्ति – अतिव्याप्ति – असंभव
दोषनो परिहार
प्रश्नः — तिर्यंचादि (पशु आदि) तुच्छज्ञानी केटलाक जीवो सात तत्त्वनां नाम
पण जाणी शकता नथी छतां तेमने पण सम्यग्दर्शननी प्राप्ति शास्त्रमां कही छे, माटे
तत्त्वार्थश्रद्धानपणुं सम्यक्त्वनुं लक्षण तमे कह्युं तेमां अव्याप्तिदूषण लागे छे?
उत्तरः — जीव – अजीवादिकनां नामादिक जाणो, न जाणो वा अन्यथा जाणो परंतु
तेनुं स्वरूप यथार्थ ओळखी श्रद्धान करतां सम्यक्त्व थाय छे.
त्यां कोई तो सामान्यपणे स्वरूप ओळखी श्रद्धान करे छे, कोई विशेषपणे स्वरूप
ओळखी श्रद्धान करे छे, माटे जे तिर्यंचादि तुच्छज्ञानी सम्यग्द्रष्टि छे ते जीवादिकनां नाम पण
जाणतां नथी तोपण तेओ सामान्यपणे तेनुं स्वरूप ओळखी श्रद्धान करे छे तेथी तेमने
सम्यक्त्वनी प्राप्ति होय छे.
जेम कोई तिर्यंच पोतानुं वा बीजाओनुं नामादिक तो न जाणे परंतु पोतानामां ज
पोतापणुं माने छे तथा अन्यने पर माने छे; तेम तुच्छज्ञानी जीव – अजीवनां नाम न जाणे
पण जे ज्ञानादिस्वरूप आत्मा छे तेमां तो ते स्वपणुं माने छे तथा जे शरीरादिक छे तेने
पर माने छे. एवुं श्रद्धान तेने होय छे ए ज जीव – अजीवनुं श्रद्धान छे, वळी जेम ते ज
तिर्यंच सुखादिनां नामादिक तो न जाणे तोपण सुखअवस्थाने ओळखी तेना अर्थे भाविदुःखनां
कारणोने पिछाणी तेनो त्याग करवा इच्छे छे तथा (वर्तमान) जे दुःखनां कारणो बनी रह्यां
छे तेना अभावनो उपाय करे छे; तेम तुच्छज्ञानी मोक्षादिकनां नाम जाणतो नथी तोपण सर्वथा
सुखरूप मोक्षअवस्थानुं श्रद्धान करी तेना अर्थे भाविबंधना कारण जे रागादि आस्रव तेना
त्यागरूप संवरने करवा इच्छे छे, तथा जे संसारदुःखनुं कारण छे तेनी शुद्धभाव द्वारा निर्जरा
करवा इच्छे छे. ए रीते आस्रवादिकनुं तेने श्रद्धान छे.
ए प्रकारे तेने पण सात तत्त्वोनुं श्रद्धान होय छे.
जो तेने एवुं श्रद्धान न होय तो रागादिक छोडी शुद्धभाव करवानी इच्छा न थाय.
ए ज अहीं कहीए छीए. जो जीवनी अने अजीवनी जाति न जाणे – स्वरूपने न ओळखे
तो ते परमां रागादिक केम न करे? जो रागादिकने न ओळखे तो तेनो त्याग करवो ते केम
इच्छे? अने ते रागादिक ज आस्रव छे, रागादिकनुं फळ बूरुं छे एम न जाणे तो ते रागादिक