नवमो अधिकार ][ ३२५
छोडवा शा माटे इच्छे? ते रागादिकनुं फळ ते ज बंध छे तथा रागादि रहित परिणामोने
ओळखे छे तो ते रूप थवा इच्छे छे, ते रागादिरहित परिणामनुं नाम ज संवर छे. वळी
पूर्व संसारअवस्थाना कारणनी हानिने ते ओळखे छे तेथी तेना अर्थे तपश्चरणादि वडे शुद्धभाव
करवा इच्छे छे. ते पूर्व संसारअवस्थानुं कारण कर्म छे, तेनी हानि ते ज निर्जरा छे. जो
संसारअवस्थाना अभावने न ओळखे तो ते संवर – निर्जरारूप शा माटे प्रवर्ते? ते संसार-
अवस्थानो अभाव ते ज मोक्ष छे. तेथी साते तत्त्वोनुं श्रद्धान थतां ज रागादिक छोडी शुद्ध
भाव थवानी इच्छा ऊपजे छे. जो एमांना एक पण तत्त्वनुं श्रद्धान न होय तो एवी इच्छा
न थाय. एवी इच्छा तुच्छज्ञानी तिर्यंचादि सम्यग्द्रष्टिने होय छे ज, तेथी तेने सात तत्त्वोनुं
श्रद्धान होय छे एवो निश्चय करवो. ज्ञानावरणनो क्षयोपशम थोडो होवाथी तेने विशेषपणे
तत्त्वोनुं ज्ञान न होय तोपण दर्शनमोहना उपशमादिक सामान्यपणे तत्त्वश्रद्धाननी शक्ति प्रगट
होय छे. ए प्रमाणे ए लक्षणमां अव्याप्तिदूषण नथी.
✾ विषय कषायादिक वखते पण सम्यकत्वीने तत्त्वश्रद्धान ✾
प्रश्नः — जे काळमां सम्यग्द्रष्टि विषय – कषायोनां कार्योमां प्रवर्ते छे ते काळमां
तेने सात तत्त्वोनो विचार ज नथी, तो त्यां श्रद्धान केवी रीते संभवे? अने सम्यक्त्व
तो तेने रहे ज छे, माटे ए लक्षणमां अव्याप्तिदूषण आवे छे.
उत्तरः — विचार छे ते तो उपयोगने आधीन छे. ज्यां उपयोग जोडाय तेनो ज
विचार थाय, पण श्रद्धान छे ते तो प्रतीतिरूप छे माटे अन्य ज्ञेयनो विचार थतां वा
शयनादिक्रिया थतां तत्त्वोनो विचार नथी तोपण तेनी प्रतीति तो कायम ज रहे छे, नष्ट थती
नथी; तेथी तेने सम्यक्त्वनो सद्भाव छे.
जेम कोई रोगी पुरुषने एवी प्रतीति छे के — ‘हुं मनुष्य छुं, तिर्यंचादि नथी, मने
आ कारणथी रोग थयो छे, अने हवे ए कारण मटाडी रोगने घटाडी निरोगी थवुं जोईए;’
हवे ते ज मनुष्य ज्यारे अन्य विचारादिरूप प्रवर्ते छे, त्यारे तेने एवो विचार होतो नथी,
परंतु श्रद्धान तो एम ज रह्या करे छे; तेम आ आत्माने एवी प्रतीति छे के — ‘हुं आत्मा
छुं – पुद्गलादि नथी, मने आस्रवथी बंध थयो छे पण हवे संवरवडे निर्जरा करी मोक्षरूप
थवुं.’ हवे ते ज आत्मा अन्य विचारादिरूप प्रवर्ते छे त्यारे तेने एवो विचार होतो नथी,
परंतु श्रद्धान तो एवुं ज रह्या करे छे.
प्रश्नः — जो तेने एवुं श्रद्धान रहे छे तो ते बंध थवानां कारणोमां केम प्रवर्ते छे?
उत्तरः — जेम ते ज मनुष्य कोई कारणवश रोग वधवानां कारणोमां पण प्रवर्ते छे,
व्यापारादिकार्य वा क्रोधादिकार्य करे छे, तोपण ते श्रद्धाननो तेने नाश थतो नथी, तेम ते ज
आत्मा कर्मोदयनिमित्तवश बंध थवाना कारणोमां पण प्रवर्ते छे, विषयसेवनादिकार्य वा क्रोधादिकार्य