३२६ ][ मोक्षमार्गप्रकाशक
करे छे, तोपण तेने ए श्रद्धाननो नाश थतो नथी. आनो विशेष निर्णय आगळ करीशुं.
ए प्रमाणे सात तत्त्वोनो विचार न होवा छतां पण तेनामां श्रद्धाननो सद्भाव छे
तेथी त्यां अव्याप्तिपणुं नथी.
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निर्विकल्पदशामां पण तत्त्वश्रद्धान ✾
प्रश्नः — उच्चदशामां ज्यां निर्विकल्प आत्मानुभव होय छे त्यां तो सात
तत्त्वादिना विकल्पनो पण निषेध कर्यो छे. हवे सम्यक्त्वना लक्षणनो निषेध करवो केम
संभवे? अने त्यां निषेध संभवे छे तो त्यां अव्याप्तिपणुं आव्युं?
उत्तरः — नीचेनी दशामां सात तत्त्वोना विकल्पमां उपयोग लगाव्यो तेथी प्रतीतिने
द्रढ करी तथा विषयादिथी उपयोगने छोडावी रागादिक घटाड्या, हवे ए कार्य सिद्ध थतां ए
ज कारणोनो पण निषेध करीए छीए. कारण के ज्यां प्रतीति पण द्रढ थई तथा रागादि
दूर थया त्यां उपयोगने भमाववानो खेद शा माटे करीए? माटे त्यां ए विकल्पोनो निषेध
कर्यो छे. वळी सम्यक्त्वनुं लक्षण तो प्रतीति ज छे, ए प्रतीतिनो तो त्यां निषेध कर्यो नथी.
जो प्रतीति छोडावी होय तो ए लक्षणनो निषेध कर्यो कहेवाय, पण एम तो नथी. सातेय
तत्त्वोनी प्रतीति तो त्यां पण कायम ज रहे छे, माटे अहीं अव्याप्तिपणुं नथी.
प्रश्नः — छद्मस्थने तो प्रतीति – अप्रतीति कहेवी संभवे छे, तेथी त्यां सात
तत्त्वोनी प्रतीतिने सम्यक्त्वनुं लक्षण कह्युं ते अमे मान्युं, पण केवळी – सिद्धभगवानने
तो सर्वनुं जाणपणुं समानरूप छे तेथी त्यां सात तत्त्वोनी प्रतीति कहेवी संभवती नथी
अने तेमने सम्यक्त्वगुण तो होय छे ज, माटे त्यां ए लक्षणमां अव्याप्तिपणुं आव्युं?
उत्तरः — जेम छद्मस्थने श्रुतज्ञान अनुसार प्रतीति होय छे तेम केवळी सिद्ध-
भगवानने केवळज्ञान अनुसार प्रतीति होय छे. जे सात तत्त्वोनुं स्वरूप पहेलां बराबर निर्णीत
कर्युं हतुं ते ज हवे केवळज्ञानवडे जाण्युं एटले त्यां प्रतीतिमां परम अवगाढपणुं थयुं. तेथी
ज त्यां परमावगाढसम्यक्त्व कह्युं छे. पूर्वे जे श्रद्धान कर्युं हतुं तेने जो जूठ जाण्युं होत तो
त्यां अप्रतीति थात; परंतु जेवुं सात तत्त्वोनुं श्रद्धान छद्मस्थने थयुं हतुं तेवुं ज केवळी –
सिद्धभगवानने पण होय छे, माटे ज्ञानादिक हीनता – अधिकता होवा छतां पण तिर्यंचादिक अने
केवळी – सिद्धभगवानने सम्यक्त्वगुण तो समान ज कह्यो.
वळी पूर्व अवस्थामां ते एम मानतो हतो के ‘संवर – निर्जरावडे मोक्षनो उपाय करवो,’
हवे मुक्तअवस्था थतां एम मानवा लाग्यो के ‘संवर – निर्जरावडे मने मुक्तदशा प्राप्त थई.’
पहेलां ज्ञाननी हीनताथी जीवादिकना थोडा भेदो जाणतो हतो अने हवे केवळज्ञान थतां तेना
सर्व भेदो जाणे छे, परंतु मूळभूत जीवादिकनां स्वरूपनुं श्रद्धान जेवुं छद्मस्थने होय छे तेवुं