Moksha Marg Prakashak-Gujarati (Devanagari transliteration).

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नवमो अधिकार ][ ३२७
ज केवळीने पण होय छे. जोके केवळीसिद्धभगवान अन्य पदार्थोने पण प्रतीति सहित जाणे
छे तोपण ते पदार्थो प्रयोजनभूत नथी तेथी सम्यक्त्वगुणमां सात तत्त्वोनुं श्रद्धान ज ग्रहण
कर्युं छे.
केवळीसिद्धभगवान रागादिरूप परिणमता नथी अने संसारअवस्थाने
इच्छता नथी ते आ श्रद्धाननुं बळ जाणवुं.
प्रश्नःसम्यग्दर्शनने तो मोक्षमार्ग कह्यो हतो, तो मोक्षमां तेनो सद्भाव
केवी रीते कहो छो?
उत्तरःकोई कारणो एवां पण होय छे केकार्य सिद्ध थवा छतां पण नष्ट थतां
नथी. जेमके कोई वृक्षने कोई एक शाखाथी अनेक शाखायुक्त अवस्था थई, तेना होवा छतां
ते एक शाखा नष्ट थती नथी; तेम कोई आत्माने सम्यक्त्व गुणवडे अनेक गुणयुक्त
मोक्षअवस्था थई, हवे ते होवा छतां पण सम्यक्त्व गुण नष्ट थतो नथी. ए प्रमाए केवळी
सिद्धभगवानने पण तत्त्वार्थश्रद्धान लक्षण ज सम्यक्त्व होय छे, माटे त्यां मिथ्याद्रष्टिनुं
तत्त्वश्रद्धान नाम निक्षेपथी होय छे अव्याप्तिपणुं नथी.
प्रश्नःमिथ्याद्रष्टिने पण तत्त्वार्थश्रद्धान होय छे एम शास्त्रमां निरूपण छे,
अने श्री प्रवचनसारमां आत्मज्ञानशून्य तत्त्वार्थश्रद्धान अकार्यकारी कह्युं छे; माटे
सम्यक्त्वनुं लक्षण तत्त्वार्थश्रद्धान कह्युं, तेमां अतिव्याप्तिदूषण लागे छे?
उत्तरःमिथ्याद्रष्टिने जे तत्त्वश्रद्धान कह्युं छे ते नामनिक्षेपथी कह्युं छे. जेमां तत्त्व -
श्रद्धाननो गुण नथी अने व्यवहारमां जेनुं नाम तत्त्वश्रद्धान कहीए छीए ते मिथ्याद्रष्टिने होय
छे, अथवा आगमद्रव्यनिक्षेपथी होय छे. तत्त्वार्थश्रद्धाननां प्रतिपादक शास्त्रोनो अभ्यास छे पण
तेना स्वरूपनो निश्चय करवामां उपयोग लगावतो नथी एम जाणवुं; अने अहीं जे सम्यक्त्वनुं
लक्षण तत्त्वार्थश्रद्धान कह्युं, ते तो भावनिक्षेपथी कह्युं छे, एवा गुणसहित साचुं तत्त्वार्थश्रद्धान
मिथ्याद्रष्टिने कदी पण होतुं नथी. वळी आत्मज्ञानशून्य तत्त्वार्थश्रद्धान कह्युं छे त्यां पण ए
ज अर्थ जाणवो; कारण के
जेने जीव
अजीवादिनुं साचुं श्रद्धान होय तेने आत्मज्ञान केम न
होय? अवश्य होय ज. ए प्रमाणे कोई पण मिथ्याद्रष्टिने साचुं तत्त्वार्थश्रद्धान सर्वथा होतुं
नथी, माटे ए लक्षणमां अतिव्याप्तिदूषण लागतुं नथी.
वळी आ तत्त्वार्थश्रद्धानलक्षण कह्युं छे ते असंभवदूषणयुक्त पण नथी. कारण के
सम्यक्त्वनुं प्रतिपक्षी मिथ्यात्व ज छे, तेनुं लक्षण आनाथी विपरीतता सहित छे.
ए प्रमाणे अव्याप्ति, अतिव्याप्ति अने असंभवपणाथी रहित तत्त्वार्थश्रद्धान सर्व
सम्यग्द्रष्टिओने तो होय छे तथा कोई पण मिथ्याद्रष्टिओने होतुं नथी, तेथी सम्यग्दर्शननुं साचुं
लक्षण तत्त्वार्थश्रद्धान ज छे.