Moksha Marg Prakashak-Gujarati (Devanagari transliteration). Samyaktvana Vibhinna Lakshanono Mel.

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३२८ ][ मोक्षमार्गप्रकाशक
सम्यक्त्वना विभिन्न लक्षणोनो मेळ
प्रश्नःअहीं सातेय तत्त्वोना श्रद्धाननो नियम कहो छो पण ते बनतो नथी,
कारण केकोई ठेकाणे परथी भिन्न पोताना श्रद्धानने ज सम्यक्त्व कहे छे. श्री
समयसार कळशमां ‘एकत्वे नियतस्य’ इत्यादि कळश छे, तेमां एम कह्युं छे के
आत्मानुं परद्रव्यथी भिन्न अवलोकन ते ज नियमथी सम्यग्दर्शन छे. तेथी नव तत्त्वनी
संततिने छोडी अमारे तो आ एक आत्मा ज प्राप्त थाओ.
वळी कोई ठेकाणे एक आत्माना निश्चयने ज सम्यक्त्व कहे छे. श्री पुरुषार्थ-
सिद्ध्यिुपायमां ‘दर्शनमात्मविनिश्चितिः’ एवुं पद छे तेनो पण एवो ज अर्थ छे, माटे जीव
अजीवनुं ज वा केवळ जीवनुं ज श्रद्धान थतां सम्यक्त्व होय छे. जो सात तत्त्वोना श्रद्धाननो
नियम होय तो आम शा माटे लखत?
उत्तरःपरथी भिन्न जे पोतानुं श्रद्धान होय छे ते आस्रवादि श्रद्धानथी रहित
होय छे के सहित होय छे? जो रहित होय छे तो मोक्षना श्रद्धान विना ते कया प्रयोजन
अर्थे आवो उपाय करे छे? संवर
निर्जराना श्रद्धान विना रागादि रहित थई स्वरूपमां
उपयोग लगाववानो उद्यम ते शा माटे राखे छे? आस्रवबंधना श्रद्धान विना ते पूर्वअवस्थाने
शा माटे छोडे छे? माटे आस्रवादिना श्रद्धानरहित स्वपरनुं श्रद्धान करवुं संभवतुं नथी; अने
जो आस्रवादिकना श्रद्धानसहित छे तो त्यां स्वयं साते तत्त्वोना श्रद्धाननो नियम थयो. वळी
केवळ आत्मानो निश्चय छे त्यां पण परनुं पररूप श्रद्धान थया विना आत्मानुं श्रद्धान थाय
नहि? माटे अजीवनुं श्रद्धान थतां ज जीवनुं श्रद्धान थाय छे; अने प्रथम कह्या प्रमाणे
आस्रवादिकनुं श्रद्धान पण त्यां अवश्य होय ज छे तेथी अहीं पण साते तत्त्वोना ज श्रद्धाननो
नियम जाणवो.
बीजुं आस्रवादिना श्रद्धान विना स्वपरनुं श्रद्धान वा केवळ आत्मानुं श्रद्धान साचुं
होतुं नथी कारण केआत्मा द्रव्य छे ते तो शुद्धअशुद्धपर्याय सहित छे. जेम तंतुना अवलोकन
विना पटनुं अवलोकन न थाय तेम शुद्धअशुद्धपर्याय ओळख्या विना आत्मद्रव्यनुं श्रद्धान न
थाय. ते शुद्धअशुद्ध अवस्थानी ओळखाण आस्रवादिनी ओळखाणथी थाय छे. आस्रवादिना
१.एकत्वे नियतस्य शुद्धनयतो व्याप्तुर्यदस्यात्मनः
पूर्णज्ञानघनस्य दर्शनमिह द्रव्यान्तरेभ्यः पृथक्
सम्यक्दर्शनमेतदेव नियमादात्मा च तावानचं
तन्मुक्त्वा नवतत्वसन्ततिमिमामात्मायमेकोऽस्तु नः
।। (समयसार कळश६)
२.दर्शनमात्मविनिश्चितिरात्मपरिज्ञानमिष्यते बोधः
स्थितिरात्मनि चारित्रं कुत एतेभ्यो भवति बन्धः
। (पुरुषार्थसिद्धि२१६)