नवमो अधिकार ][ ३२९
श्रद्धान विना स्व – परनुं श्रद्धान वा केवळ आत्मानुं श्रद्धान कार्यकारी पण नथी कारण के —
(एवुं) श्रद्धान करो वा न करो ‘पोते छे ते पोते ज छे अने पर छे ते पर छे.’ वळी
आस्रवादिनुं श्रद्धान होय तो आस्रव – बंधनो अभाव करी संवर – निर्जरारूप उपायथी मोक्षपदने
प्राप्त करे, तथा स्व – परनुं पण श्रद्धान करावीए छीए ते ए ज प्रयोजन अर्थे करावीए छीए;
माटे आस्रवादिकना श्रद्धानसहित स्व – परनुं जाणवुं वा स्वनुं जाणवुं कार्यकारी छे.
प्रश्नः — जो एम छे तो शास्त्रोमां स्व – परना श्रद्धानने वा केवळ आत्माना
श्रद्धानने ज सम्यक्त्व कह्युं वा कार्यकारी कह्युं तथा नव तत्त्वनी संतति छोडी अमारे
तो एक आत्मा ज प्राप्त थाओ, एम केम कह्युं छे?
उत्तरः — जेने स्व – परनुं वा आत्मानुं सत्य श्रद्धान होय तेने साते तत्त्वोनुं श्रद्धान
अवश्य होय ज, तथा जेने साते तत्त्वोनुं सत्यश्रद्धान होय तेने स्व – परनुं वा आत्मानुं श्रद्धान
अवश्य होय ज. एवुं परस्पर अविनाभावपणुं जाणी स्व – परना श्रद्धानने वा आत्मश्रद्धानने
ज सम्यक्त्व कह्युं छे.
पण ए छळथी कोई सामान्यपणे स्व – परने जाणी वा आत्माने जाणी कृतकृत्यपणुं माने
तो तेने भ्रम छे. कारण के एम कह्युं छे के – निर्विशेषो हि सामान्यं ‘भवेत्खरविषाणवत्’ एनो अर्थ —
विशेषरहित सामान्य छे ते गधेडाना शींगडा समान छे. माटे प्रयोजनभूत आस्रवादि
विशेषोसहित स्व – परनुं वा आत्मानुं श्रद्धान करवा योग्य छे; अथवा साते तत्त्वार्थोना श्रद्धानथी
जे रागादिक मटाडवा अर्थे परद्रव्योने भिन्न चिंतवे छे, वा पोताना आत्माने ज चिंतवे छे तेने
प्रयोजननी सिद्धि थाय छे, तेथी मुख्यपणे भेदविज्ञानने वा आत्मज्ञानने कार्यकारी कह्युं छे.
वळी तत्त्वार्थश्रद्धान कर्या विना सर्व जाणवुं कार्यकारी नथी, कारण के — प्रयोजन तो
रागादि मटाडवानुं छे. हवे आस्रवादिना श्रद्धान विना ए प्रयोजन भासतुं नथी त्यारे केवळ
जाणवाथी ज मानने वधारे छे, रागादि छोडे नहि, तो तेनुं कार्य केवी रीते सिद्ध थाय? बीजुं
ज्यां नव तत्त्वनी संततिने छोडवानुं कह्युं छे, त्यां पूर्वे नव तत्त्वना विचारवडे सम्यग्दर्शन थयुं
अने पाछळथी निर्विकल्पदशा थवा अर्थे नव तत्त्वोनो पण विकल्प छोडवानी इच्छा करी; पण
जेने पहेलां ज नव तत्त्वोनो विचार नथी तेने ते विकल्पो छोडवानुं शुं प्रयोजन छे? अन्य
अनेक विकल्पो पोताने थाय छे तेनो ज त्याग करो.
ए प्रमाणे स्व – परना श्रद्धानमां वा आत्मश्रद्धानमां सात तत्त्वोना श्रद्धाननी सापेक्षता
होय छे, माटे तत्त्वार्थश्रद्धान सम्यक्त्वनुं लक्षण छे.
प्रश्नः — त्यारे कोई ठेकाणे शास्त्रोमां अर्हंतदेव, निर्ग्रंथगुरु अने हिंसादिरहित
धर्मना श्रद्धानने सम्यक्त्व कह्युं छे ते केवी रीते?