Moksha Marg Prakashak-Gujarati (Devanagari transliteration).

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३३० ][ मोक्षमार्गप्रकाशक
उत्तरःअरहंतदेवादिकनुं श्रद्धान थवाथी वा कुदेवादिनुं श्रद्धान दूर थवाथी गृहीत-
मिथ्यात्वनो अभाव थाय छे ए अपेक्षाए तेने सम्यग्द्रष्टि कह्यो छे, पण सम्यक्त्वनुं सर्वथा
लक्षण ए नथी, कारण के
द्रव्यलिंगी मुनि आदि व्यवहारधर्मना धारक मिथ्याद्रष्टिओने पण
एवुं श्रद्धान तो होय छे.
अथवा जेम अणुव्रत, महाव्रत होय छतां देशचारित्र, सकलचारित्र होय वा न होय,
परंतु अणुव्रत थया विना देशचारित्र तथा महाव्रत थया विना सकलचारित्र कदी पण होय
नहि, माटे ए व्रतोने अन्वयरूप कारण जाणी कारणमां कार्यनो उपचार करी तेने चारित्र कह्युं
छे; तेम अरहंतदेवादिकनुं श्रद्धान थतां तो सम्यक्त्व होय वा न होय परंतु अरहंतादिकना
श्रद्धान थया विना तत्त्वार्थश्रद्धानरूप सम्यक्त्व कदीपण होय नहि, माटे अरिहंतादिकना श्रद्धानने
अन्वयरूप कारण जाणी कारणमां कार्यनो उपचार करी ए श्रद्धानने सम्यक्त्व कह्युं छे, अने
एटला ज माटे तेनुं नाम व्यवहारसम्यक्त्व छे.
अथवा जेने तत्त्वार्थश्रद्धान होय तेने साचा अरहंतादिकना स्वरूपनुं श्रद्धान अवश्य होय
ज. तत्त्वार्थश्रद्धान विना अरहंतादिकनुं श्रद्धान पक्षथी करे तोपण यथावत् स्वरूपनी ओळखाण
सहित श्रद्धान थाय नहि, तथा जेने साचा अरहंतादिकना स्वरूपनुं श्रद्धान होय तेने तत्त्वार्थ -
श्रद्धान अवश्य होय ज, कारण के अरहंतादिना स्वरूपने ओळखतां जीव
अजीवआस्रवादिनी
ओळखाण थाय छे.
ए प्रमाणे तेने परस्पर अविनाभावी जाणी कोई ठेकाणे अरहंतादिना श्रद्धानने
सम्यक्त्व कह्युं छे.
प्रश्नःनारकादि जीवोने देवकुदेवादिनो व्यवहार नथी छतां तेमने सम्यक्त्व
तो होय छे; माटे सम्यक्त्व थतां अरहंतादिनुं श्रद्धान अवश्य होय ज एवो नियम
संभवतो नथी?
उत्तरःसात तत्त्वोना श्रद्धानमां अरहंतादिनुं श्रद्धान गर्भित छे, कारण के
तत्त्वश्रद्धानमां मोक्षतत्त्वने ते सर्वोत्कृष्ट माने छे, हवे मोक्षतत्त्व तो अरहंतसिद्धनुं ज लक्षण
छे अने जे लक्षणने उत्कृष्ट माने छे, ते तेना लक्ष्यने पण उत्कृष्ट अवश्य माने ज; तेथी तेमने
ज सर्वोत्कृष्ट मान्या पण अन्यने न मान्या ए ज तेने देवनुं श्रद्धान थयुं. वळी मोक्षनुं कारण
संवर
निर्जरा छे तेथी तेने पण ते उत्कृष्ट माने छे अने संवरनिर्जराना धारक मुख्यपणे
मुनिराज छे तेथी ते मुनिराजने उत्तम माने छे, पण अन्यने उत्तम मानतो नथी, ए ज
तेने गुरुनुं श्रद्धान थयुं. बीजुं रागादिरहित भावनुं नाम अहिंसा छे, तेने ते उपादेय माने
छे, पण अन्यने मानतो नथी, ए ज तेने धर्मनुं श्रद्धान थयुं. ए प्रमाणे तत्त्वार्थश्रद्धानमां
अरहंतदेवादिकनुं श्रद्धान पण गर्भित होय छे अथवा जे निमित्तथी तेने तत्त्वार्थश्रद्धान थाय