३३२ ][ मोक्षमार्गप्रकाशक
ज्यां स्व – परनी भिन्नता श्रद्धानरूप लक्षण कह्युं छे त्यां जे वडे तत्त्वार्थश्रद्धाननुं
प्रयोजन सिद्ध थाय ते श्रद्धानने मुख्य लक्षण कह्युं छे. कारण के जीव – अजीवना श्रद्धाननुं
प्रयोजन तो स्व – परने भिन्न श्रद्धान करवां ए छे, अने आस्रवादिकना श्रद्धाननुं प्रयोजन
रागादिक छोडवा ए छे; एटले स्व – परनी भिन्नतानुं श्रद्धान थतां परद्रव्योमां रागादिक न
करवानुं श्रद्धान थाय छे. ए प्रमाणे तत्त्वार्थश्रद्धाननुं प्रयोजन स्व – परना भिन्न श्रद्धानथी सिद्ध
थवुं जाणी ए लक्षणने कह्युं छे.
तथा ज्यां आत्मश्रद्धान लक्षण कह्युं छे त्यां स्व – परना भिन्न श्रद्धाननुं प्रयोजन तो
एटलुं ज छे के – पोताने पोतारूप जाणवो. पोताने पोतारूप जाणतां परनो पण विकल्प कार्यकारी
नथी. एवा मूळभूत प्रयोजननी प्रधानता जाणी आत्मश्रद्धानने मुख्य लक्षण कह्युं छे.
तथा ज्यां देव – गुरु – धर्मना श्रद्धानरूप लक्षण कह्युं छे त्यां बाह्यसाधननी प्रधानता करी
छे, कारण के – अरहंतदेवादिकनुं श्रद्धान साचा तत्त्वार्थश्रद्धाननुं कारण छे तथा कुदेवादिकनुं श्रद्धान
कल्पित तत्त्वश्रद्धाननुं कारण छे, ए बाह्य कारणनी प्रधानताथी कुदेवादिकनुं श्रद्धान छोडावी
सुदेवादिकनुं श्रद्धान कराववा अर्थे देव – गुरु – धर्मना श्रद्धानने मुख्य लक्षण कह्युं छे.
ए प्रमाणे जुदां जुदां प्रयोजननी मुख्यता वडे जुदां जुदां लक्षण कह्यां छे.
प्रश्नः — ए चार लक्षणो कह्यां तेमां आ जीव कया लक्षणने अंगीकार करे?
उत्तरः — ज्यां मिथ्यात्वकर्मनो उपशमादिक थतां विपरीताभिनिवेशनो अभाव थाय छे
त्यां ए चारे लक्षणो एकसाथ होय छे. तथा विचार अपेक्षाए मुख्यपणे तत्त्वार्थोने विचारे
छे, कां तो स्व – परनुं भेदविज्ञान करे छे, कां तो आत्मस्वरूपनुं ज स्मरण करे छे अगर
कां तो देवादिकना स्वरूपने विचारे छे. ए प्रमाणे ज्ञानमां तो नाना प्रकारना विचार होय
छे, परंतु श्रद्धानमां सर्वत्र परस्पर सापेक्षपणुं होय छे. जेम – तत्त्वविचार करे छे तो
भेदविज्ञानादिकना अभिप्रायसहित करे छे, तथा भेदविज्ञान करे छे तो तत्त्वविचार आदिना
अभिप्रायसहित करे छे; ए ज प्रमाणे अन्य ठेकाणे पण परस्पर सापेक्षपणुं छे. माटे
सम्यग्द्रष्टिना श्रद्धानमां चारे लक्षणोनो अंगीकार छे.
पण जेने मिथ्यात्वनो उदय छे तेने विपरीताभिनिवेश होय छे, तेने ए लक्षणो
आभासमात्र होय छे, साचां होतां नथी. ते जिनमतनां जीवादितत्त्वोने माने छे अन्यने मानतो
नथी तथा तेनां नाम – भेदादिने शीखे छे; ए प्रमाणे तेने तत्त्वार्थश्रद्धान होय छे; परंतु तेने
यथार्थ भावनुं श्रद्धान होतुं नथी. वळी ए स्व – परना भिन्नपणानी वातो करे, चिंतवन करे,
परंतु जेवी पर्यायमां अहंबुद्धि छे तथा वस्त्रादिकमां परबुद्धि छे, तेवी आत्मामां अहंबुद्धि अने
शरीर आदिमां परबुद्धि तेने होती नथी. तथा ते आत्मानुं जिनवचनानुसार चिंतवन करे छे,