Moksha Marg Prakashak-Gujarati (Devanagari transliteration).

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नवमो अधिकार ][ ३३३
परंतु प्रतीतिपणे स्वने स्वरूप श्रद्धान करतो नथी. तथा अरहंतदेवादिक विना अन्य
कुदेवादिकोने मानतो नथी, परंतु तेना स्वरूपने यथार्थ ओळखी श्रद्धान करतो नथी. ए प्रमाणे
ए लक्षणाभासो मिथ्याद्रष्टिने होय छे, तेमां कोई होय कोई न होय, त्यां तेने भिन्नपणुं
पण संभवे छे.
बीजुं ए लक्षणाभासोमां एटलुं विशेष छे केपहेलां तो देवादिकनुं श्रद्धान थाय, पछी
तत्त्वोनो विचार थाय, पछी स्वपरनुं चिंतवन करे अने पछी केवळ आत्माने चिंतवे; ए
अनुक्रमथी जो साधन करे तो परंपरा साचा मोक्षमार्गने पामी कोई जीव सिद्धपदने पण प्राप्त
करी ले, तथा ए अनुक्रमनुं उल्लंघन करीने जेने देवादिकनी मान्यतानुं तो कांई ठेकाणुं नथी
तथा बुद्धिनी तीव्रताथी तत्त्वविचारादिमां प्रवर्ते छे अने तेथी पोताने ज्ञानी माने छे अथवा
तत्त्वविचारमां पण उपयोग लगावतो नथी, पोताने स्व
परनो भेदविज्ञानी थयो विचारे छे,
अथवा स्वपरनो पण यथार्थ निर्णय करतो नथी छतां पोताने आत्मज्ञानी माने छे, पण ए
बधी चतुराईनी वातो छे, मानादि कषायनां साधन छे; कांई पण कार्यकारी नथी. माटे जे
जीव पोतानुं भलुं करवा इच्छे तेणे तो ज्यांसुधी साचा सम्यग्दर्शननी प्राप्ति न थाय त्यांसुधी
एने पण अनुक्रमथी ज अंगीकार करवां.
ए ज अहीं कहीए छीएप्रथम आज्ञादिवडे वा कोई परीक्षावडे कुदेवादिनी मान्यता
छोडी अरहंतदेवादिकनुं श्रद्धान करवुं, कारण केएनुं श्रद्धान थतां गृहीतमिथ्यात्वनो तो अभाव
थाय छे तथा मोक्षमार्गमां विघ्न करवावाळा कुदेवादिकनुं निमित्त दूर थाय छे अने मोक्षमार्गने
सहायक अरहंत देवादिकनुं निमित्त मळे छे माटे प्रथम देवादिकनुं श्रद्धान करवुं. पछी
जिनमतमां कहेलां जीवादितत्त्वोनो विचार करवो, तेनां नाम
लक्षणादि शीखवां, कारण केएना
अभ्यासथी तत्त्वश्रद्धाननी प्राप्ति थाय छे. पछी स्वपरनुं भिन्नपणुं जेथी भासे तेवा विचारो
कर्या करवां, कारण केए अभ्यासथी भेदविज्ञान थाय छे. त्यार पछी एक स्वमां स्वपणुं
मानवा अर्थे स्वरूपनो विचार कर्या करवो. कारण केए अभ्यासथी आत्मानुभवनी प्राप्ति
थाय छे.
ए प्रमाणे अनुक्रमथी तेने अंगीकार करी पछी तेमांथी ज कोई वेळा देवादिना
विचारमां, कोई वेळा तत्त्वविचारमां, कोई वेळा स्वपरना विचारमां तथा कोई वेळा
आत्मविचारमां उपयोगने लगाववो. ए प्रमाणे अभ्यासथी दर्शनमोह मंद थतो जाय छे, अने
कदाचित् सत्य सम्यग्दर्शननी प्राप्ति थाय छे, परंतु थाय ज एवो नियम तो नथी; कोई जीवने
कोई प्रबळ विपरीत कारण वच्चे आवी जाय तो सम्यग्दर्शननी प्राप्ति न पण थाय, परंतु
मुख्यपणे घणा जीवोने तो ए अनुक्रमथी कार्यसिद्धि थाय छे. माटे तेने ए ज प्रमाणे अंगीकार
करवां. जेम
पुत्रनो अर्थी विवाहादि कारणोने तो मेळवे, तेमां घणा पुरुषोने पुत्रनी प्राप्ति थाय
ज, छतां कोईने न थाय तो न पण थाय, परंतु तेणे तो उपाय करवो; तेम सम्यक्त्वनो अर्थी