Moksha Marg Prakashak-Gujarati (Devanagari transliteration). Samyaktvana Bhed.

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नवमो अधिकार ][ ३३५
अथवा तत्त्वार्थश्रद्धान लक्षणमां तो देवादिनुं श्रद्धान वा स्वपरनुं श्रद्धान वा
आत्मश्रद्धान गर्भित होय छे ते तो तुच्छबुद्धिवानने पण भासे छे, पण अन्य लक्षणोमां
तत्त्वार्थश्रद्धाननुं गर्भितपणुं छे ते विशेष बुद्धिवान होय तेने ज भासे छे, पण तुच्छबुद्धिवानने
भासतुं नथी, माटे तत्त्वार्थश्रद्धानलक्षणने मुख्य कर्युं छे.
अथवा मिथ्याद्रष्टिने ए आभासमात्र होय छे; त्यां तत्त्वार्थोनो विचार तो
विपरीताभिनिवेश दूर करवामां शीघ्र कारणरूप थाय छे पण अन्य लक्षणो शीघ्र कारणरूप थतां
नथी वा विपरीताभिनिवेशनां पण कारण थई जाय छे.
तेथी अहीं सर्वप्रकारथी प्रसिद्ध जाणी विपरीताभिनिवेशरहित जीवादितत्त्वार्थोनुं श्रद्धान
ते ज सम्यक्त्वनुं लक्षण छे एवो निर्देश कर्यो. ए प्रमाणे लक्षणनिर्देशनुं निरूपण कर्युं.
एवुं लक्षण जे आत्माना स्वभावमां होय ते ज सम्यग्द्रष्टि जाणवो.
सम्यक्त्वना भेद
हवे ए सम्यक्त्वना भेद दर्शावीए छीए.
प्रथम निश्चय अने व्यवहारनो भेद बतावीए छीएविपरीताभिनिवेशरहित श्रद्धानरूप
आत्माना परिणाम ते तो निश्चयसम्यक्त्व छे, कारण के ए सत्यार्थ सम्यक्त्वनुं स्वरूप छे अने
सत्यार्थनुं नाम ज निश्चय छे, तथा ए विपरीताभिनिवेशरहित श्रद्धानने कारणभूत श्रद्धान ते
व्यवहारसम्यक्त्व छे, कारण के
अहीं कारणमां कार्यनो उपचार कर्यो छे, अने उपचारनुं नाम
ज व्यवहार छे.
त्यां सम्यग्द्रष्टि जीवने देवगुरुधर्मादिकनुं साचुं श्रद्धान छे, तेना ज निमित्तथी तेना
श्रद्धानमां विपरीताभिनिवेशनो अभाव छे. अहीं विपरीताभिनिवेशरहित श्रद्धान ते तो निश्चय-
सम्यक्त्व छे तथा देव
गुरुधर्मादिनुं श्रद्धान ते व्यवहारसम्यक्त्व छे.
ए प्रमाणे एक ज काळमां बंने सम्यक्त्व होय छे.
तथा मिथ्याद्रष्टि जीवने देवगुरुधर्मादिकनुं श्रद्धान आभासमात्र होय छे अने तेना
श्रद्धानमां विपरीताभिनिवेशनो अभाव होतो नथी, माटे ते निश्चयसम्यक्त्व तो छे नहि तथा
व्यवहारसम्यक्त्व पण आभासमात्र छे, कारण के तेने देव
गुरुधर्मादिनुं श्रद्धान छे
ते विपरीताभिनिवेशना अभावने साक्षात् कारण थयुं नहि अने कारण थया विना तेमां
उपचार पण संभवतो नथी. माटे साक्षात् कारणनी अपेक्षाए तेने व्यवहार सम्यक्त्व पण
संभवतुं नथी.
अथवा तेने देवगुरुधर्मादिकनुं श्रद्धान नियमरूप होय छे ते विपरीताभिनिवेशरहित