Moksha Marg Prakashak-Gujarati (Devanagari transliteration).

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नवमो अधिकार ][ ३३७
वळी अन्य निमित्तादिनी अपेक्षाए आज्ञासम्यक्त्वादि दश भेद पण कह्या छे, ते
आत्मानुशासनमां कह्या छे. यथा
आज्ञामार्गसमुद्भवमुपदेशात् सूत्रबीजसंक्षेपात्
विस्तारार्थाभ्या भवमवगाढपरमावगाढे च ।।११।।
अर्थःजिनआज्ञाथी तत्त्वश्रद्धान थयुं होय ते आज्ञासम्यक्त्व छे.
अहीं एटलुं जाणवुं के ‘मारे जिनआज्ञा प्रमाण छे’ एटलुं ज श्रद्धान कांई सम्यक्त्व
नथी, आज्ञा मानवी ए तो कारणभूत छे तेथी अहीं आज्ञाथी उत्पन्न थयुं कह्युं छे, माटे
प्रथम जिनआज्ञा मानवा पछी जे तत्त्वश्रद्धान थयुं ते आज्ञासम्यक्त्व छे. (२) ए ज प्रमाणे
निर्ग्रंथमार्गना अवलोकनथी जे तत्त्वश्रद्धान थयुं होय ते मार्गसम्यक्त्व छे. (३) तीर्थंकरादि
उत्कृष्ट पुरुषोना पुराणोना उपदेशथी उत्पन्न थयेला सम्यग्ज्ञान वडे अर्थात् आगमसमुद्रमां
प्रवीण पुरुषोना उपदेश आदिथी प्राप्ति थयेली जे उपदेशद्रष्टि ते उपदेशसम्यक्त्व छे.
(४) मुनिजनोना आचरणविधानने प्रतिपादन करता एवा आचारसूत्रोने सांभळी जे श्रद्धान
करवुं थाय तेने भला प्रकारथी सूत्रद्रष्टि कही छे, अने ते सूत्रसम्यक्त्व छे. (५) बीज जे
गणितज्ञाननुं कारण तेना वडे दर्शनमोहना अनुपम उपशमना बळथी दुष्कर छे जाणवानी गति
जेनी एवा पदार्थोनो समूह तेनी थई छे उपलब्धि अर्थात् श्रद्धारूप परिणति जेने
एवा
जे करणानुयोगना ज्ञानी भव्य तेने बीजद्रष्टि थाय छे बीजसम्यक्त्व जाणवुं. (६) पदार्थोना
संक्षेपपणाथी जाणवा वडे जे श्रद्धान थयुं होय ते भली संक्षेपद्रष्टि छे अने तेने संक्षेपसम्यक्त्व
जाणवुं. (७) द्वादशांगवाणीने सांभळी करेली जे रुचि अर्थात् श्रद्धान तेने हे भव्य! तुं
विस्तारद्रष्टि जाण, अने ते विस्तारसम्यक्त्व छे. (८) जैनशास्त्रोना वचन विना कोई अर्थना
निमित्तथी थयेली जे अर्थद्रष्टि, तेने अर्थसम्यक्त्व जाणवुं. ए आठ भेद तो कारणोनी अपेक्षाए
कर्या छे तथा (९) श्रुतकेवळी जे तत्त्वश्रद्धान छे तेने अवगाढसम्यक्त्व कहीए छीए.
(१०) केवळज्ञानीने जे तत्त्वश्रद्धान छे तेने परमावगाढसम्यक्त्व कहीए छीए. ए छेल्ला बे
भेद ज्ञानना सहकारीपणानी अपेक्षाए कर्या छे.
ए प्रमाणे सम्यक्त्वना दश भेद कह्या.
त्यां सर्व ठेकाणे सम्यक्त्वनुं स्वरूप तत्त्वार्थश्रद्धान ज जाणवुं.
वळी सम्यक्त्वना त्रण भेद पण कर्या छे
१ औपशमिक, २ क्षायोपशमिक अने
३. क्षायिक. ए त्रण भेद दर्शनमोहनी अपेक्षाए कर्या छे.
तेमां औपशमिक सम्यक्त्वना बे भेद छे, एक प्रथमोपशमसम्यक्त्व तथा बीजुं
द्वितीयोपशमसम्यक्त्व, त्यां मिथ्यात्वगुणस्थानमां करणवडे दर्शनमोहने उपशमावी जे सम्यक्त्व