प्रथम जिनआज्ञा मानवा पछी जे तत्त्वश्रद्धान थयुं ते आज्ञासम्यक्त्व छे. (२) ए ज प्रमाणे
निर्ग्रंथमार्गना अवलोकनथी जे तत्त्वश्रद्धान थयुं होय ते मार्गसम्यक्त्व छे. (३) तीर्थंकरादि
उत्कृष्ट पुरुषोना पुराणोना उपदेशथी उत्पन्न थयेला सम्यग्ज्ञान वडे अर्थात् आगमसमुद्रमां
प्रवीण पुरुषोना उपदेश आदिथी प्राप्ति थयेली जे उपदेशद्रष्टि ते उपदेशसम्यक्त्व छे.
(४) मुनिजनोना आचरणविधानने प्रतिपादन करता एवा आचारसूत्रोने सांभळी जे श्रद्धान
करवुं थाय तेने भला प्रकारथी सूत्रद्रष्टि कही छे, अने ते सूत्रसम्यक्त्व छे. (५) बीज जे
गणितज्ञाननुं कारण तेना वडे दर्शनमोहना अनुपम उपशमना बळथी दुष्कर छे जाणवानी गति
जेनी एवा पदार्थोनो समूह तेनी थई छे उपलब्धि अर्थात् श्रद्धारूप परिणति जेने
संक्षेपपणाथी जाणवा वडे जे श्रद्धान थयुं होय ते भली संक्षेपद्रष्टि छे अने तेने संक्षेपसम्यक्त्व
जाणवुं. (७) द्वादशांगवाणीने सांभळी करेली जे रुचि अर्थात् श्रद्धान तेने हे भव्य! तुं
विस्तारद्रष्टि जाण, अने ते विस्तारसम्यक्त्व छे. (८) जैनशास्त्रोना वचन विना कोई अर्थना
निमित्तथी थयेली जे अर्थद्रष्टि, तेने अर्थसम्यक्त्व जाणवुं. ए आठ भेद तो कारणोनी अपेक्षाए
कर्या छे तथा (९) श्रुतकेवळी जे तत्त्वश्रद्धान छे तेने अवगाढसम्यक्त्व कहीए छीए.
(१०) केवळज्ञानीने जे तत्त्वश्रद्धान छे तेने परमावगाढसम्यक्त्व कहीए छीए. ए छेल्ला बे
भेद ज्ञानना सहकारीपणानी अपेक्षाए कर्या छे.
त्यां सर्व ठेकाणे सम्यक्त्वनुं स्वरूप तत्त्वार्थश्रद्धान ज जाणवुं.
वळी सम्यक्त्वना त्रण भेद पण कर्या छे