३४० ][ मोक्षमार्गप्रकाशक
कहीए त्यां वेदक नाम पामे छे पण ए कहेवामात्र बे नाम छे, स्वरूपमां भेद नथी. तथा
आ क्षयोपशमसम्यक्त्व चोथाथी सातमा गुणस्थान सुधी होय छे.
ए प्रमाणे क्षयोपशमसम्यक्त्वनुं स्वरूप कह्युं.
वळी ए त्रणे प्रकृतिओना सर्व निषेकोनो सर्वथा नाश थतां जे अत्यंत निर्मळ तत्त्वार्थ -
श्रद्धान थाय ते क्षायिकसम्यक्त्व छे. ते चतुर्थादि चार गुणस्थानोमां कोई ठेकाणे क्षयोपशम-
सम्यग्द्रष्टिने तेनी प्राप्ति थाय छे.
केवी रीते थाय छे ते अहीं कहीए छीए — प्रथम त्रण करणवडे मिथ्यात्वना
परमाणुओने मिश्रमोहनीयरूपे वा सम्यक्त्वमोहनीयरूपे परिणमावे अथवा तेनी निर्जरा करे, –
ए प्रमाणे मिथ्यात्वनी सत्तानो नाश करे, तथा मिश्रमोहनीयना परमाणुओने सम्यक्त्व-
मोहनीयरूपे परिणमावे वा तेनी निर्जरा करे, — ए प्रमाणे मिश्रमोहनीयनो नाश करे. वळी
सम्यक्त्वमोहनीयना निषेको उदयमां आवी खरी जाय, जो तेनी स्थिति आदि घणी होय तो
तेने स्थितिकांडकादिकवडे घटाडे, ज्यारे अंतर्मुहूर्त स्थिति रहे त्यारे ते कृतकृत्य वेदकसम्यग्द्रष्टि
थाय छे, अने अनुक्रमथी ए निषेकोनो नाश करी क्षायिकसम्यग्द्रष्टि थाय छे.
प्रतिपक्षीकर्मना अभावथी आ सम्यक्त्व निर्मळ छे वा मिथ्यात्वरूपी रंजनाना अभावथी
वीतराग छे. वळी एनो नाश थतो नथी पण ज्यारथी उत्पन्न थाय त्यारथी सिद्धअवस्था सुधी
तेनो सद्भाव रहे छे.
ए प्रमाणे क्षायिकसम्यक्त्वनुं स्वरूप कह्युं.
ए प्रमाणे सम्यक्त्वना त्रण भेदो छे.
वळी अनंतानुबंधी कषायनी सम्यक्त्व थतां बे अवस्थाओ थाय छे – कां तो अप्रशस्त
उपशम थाय छे अगर विसंयोजन थाय छे.
त्यां जे करणवडे उपशमविधानथी उपशम थाय छे तेनुं नाम प्रशस्त उपशम छे तथा
उदयनो अभाव तेनुं नाम अप्रशस्त उपशम छे.
हवे अनंतानुबंधीनो प्रशस्त उपशम तो थाय ज नहि पण मोहनीयनी अन्य
प्रकृतिओनो थाय छे. अनंतानुबंधीनो अप्रशस्त उपशम थाय छे.
वळी जे त्रण करणवडे अनंतानुबंधीना परमाणुओने अन्य चारित्रमोहनीयनी प्रकृतिरूप
परिणमावी तेनी सत्तानो नाश करवामां आवे तेनुं नाम विसंयोजन छे.
तेमां प्रथमोपशमसम्यक्त्वमां तो अनंतानुबंधीनो अप्रशस्त उपशम ज छे तथा
द्वितीयोपशमसम्यक्त्वनी प्राप्ति तो प्रथम अनंतानुबंधीनी विसंयोजना थया पछी ज थाय एवो