Moksha Marg Prakashak-Gujarati (Devanagari transliteration).

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नवमो अधिकार ][ ३४१
नियम कोई आचार्य लखे छे अने कोई नथी लखता. बीजुं क्षयोपशमसम्यक्त्वमां कोई जीवने
अप्रशस्त उपशम थाय छे वा कोईने विसंयोजन थाय छे, तथा क्षायिकसम्यक्त्व छे ते पहेलां
अनंतानुबंधीनुं विसंयोजन थया पछी ज थाय छे एम जाणवुं.
अहीं आटलुं विशेष केउपशम अने क्षयोपशमसम्यग्द्रष्टिने तो अनंतानुबंधीना
विसंयोजनथी सत्तानो नाश थयो हतो पण जो ते फरीने मिथ्यात्वमां आवे तो अनंतानुबंधीनो
बंध करे त्यां फरीथी तेनी सत्तानो सद्भाव थाय छे, अने क्षायिक सम्यग्द्रष्टि मिथ्यात्वमां
आवतो ज नथी तेथी तेने अनंतानुबंधीनी सत्ता कदी पण होती नथी.
प्रश्नःअनंतानुबंधी तो चारित्रमोहनीयनी प्रकृति छे, ते चारित्रनो घात
करे; पण ए वडे सम्यक्त्वनो घात केवी रीते संभवे?
उत्तरःअनंतानुबंधीना उदयथी क्रोधादिरूप परिणाम थाय छे पण कांई अतत्त्व -
श्रद्धान थतुं नथी, माटे अनंतानुबंधी चारित्रनो ज घात करे छे पण सम्यक्त्वने घातती नथी;
परमार्थथी तो एम ज छे, परंतु अनंतानुबंधीना उदयथी जेवा क्रोधादिक थाय छे तेवा क्रोधादिक
सम्यक्त्वना सद्भावमां थता नथी एवुं तेमां निमित्त
नैमित्तिकपणुं होय छे. जेमत्रसपणानी
घातक तो स्थावरप्रकृति ज छे परंतु त्रसपणाना सद्भावमां एकेन्द्रियजाति प्रकृतिनो पण उदय
थतो नथी तेथी उपचारथी एकेन्द्रियप्रकृतिने पण त्रसपणानी घातक कहीए तो त्यां दोष नथी; तेम
सम्यक्त्वनो घातक तो दर्शनमोह छे, परंतु सम्यक्त्वना सद्भावमां अनंतानुबंधी कषायोनो पण
उदय थतो नथी तेथी उपचारथी अनंतानुबंधीने पण सम्यक्त्वनुं घातकपणुं कहीए तो दोष नथी.
प्रश्नःजो अनंतानुबंधी पण चारित्रने ज घाते छे तो तेनो अभाव थतां
कंईक चारित्र थयुं कहो, पण असंयतगुणस्थानमां असंयम शा माटे कहो छो?
उत्तरःअनंतानुबंधी आदि भेद छे ते कषायोनी तीव्रमंदतानी अपेक्षाए नथी,
कारण केमिथ्याद्रष्टिने तीव्रकषाय थतां वा मंदकषाय थतां पण अनंतानुबंधी आदि चारे
कषायोनो उदय युगपत् होय छे, अने त्यां चारेयना उत्कृष्ट स्पर्धक समान कह्या छे.
एटलुं विशेष छे केअनंतानुबंधीनी साथे अप्रत्याख्यानावरणादि जेवो तीव्र उदय
होय छे तेवो तेना गया पछी होतो नथी, तथा ए ज प्रमाणे अप्रत्याख्यानावरणनी साथे
प्रत्याख्यान अने संज्वलननो जेवो उदय होय छे तेवो तेना गया पछी होतो नथी, तथा
प्रत्याख्याननी साथे जेवो संज्वलननो उदय होय छे तेवो एकला संज्वलननो उदय होतो नथी,
माटे अनंतानुबंधी गया पछी कंईक कषायोनी मंदता तो थाय छे परंतु एवी मंदता थती नथी
के जेथी कोई चारित्र नाम पामे, कारण के
कषायोनां असंख्यात लोकप्रमाण स्थान छे, तेमां
सर्वत्र पूर्वस्थानथी उत्तरस्थानमां मंदता होय छे परंतु व्यवहारथी ते स्थानोमां त्रण मर्यादा
करी; प्रथमनां घणां स्थान तो असंयमरूप कह्यां, पछी केटलांक देशसंयमरूप कह्यां अने पछी