Moksha Marg Prakashak-Gujarati (Devanagari transliteration).

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३४२ ][ मोक्षमार्गप्रकाशक
केटलांक सकळसंयमरूप कह्यां; तेमां प्रथम गुणस्थानथी मांडी चोथा गुणस्थान सुधी कषायनां
जे स्थान होय छे ते बधां असंयमना ज होय छे, तेथी त्यां कषायोनी मंदता होवा छतां
पण चारित्र नाम पामतां नथी.
जोके परमार्थथी कषायनुं घटवुं ए चारित्रनो अंश छे तोपण व्यवहारथी ज्यां कषायोनुं
एवुं घटवुं थाय के जेथी श्रावकधर्म वा मुनिधर्मनो अंगीकार थाय त्यां ज चारित्र नाम पामे
छे. हवे असंयतगुणस्थानमां एवा कषाय घटतां नथी तेथी त्यां असंयम कह्यो छे. वळी
कषायोनी अधिकता
हीनता होवा छतां पण जेम प्रमत्तादि गुणस्थानोमां सर्वत्र सकळसंयम ज
नाम पामे छे तेम मिथ्यात्वथी असंयत सुधीना गुणस्थानोमां असंयम नाम पामे छे पण सर्व
ठेकाणे असंयमनी समानता न जाणवी.
प्रश्नःजो अनंतानुबंधीप्रकृति सम्यक्त्वने घातती नथी तो तेनो उदय थतां
सम्यक्त्वथी भ्रष्ट थई सासादन गुणस्थानने केम पामे छे?
उत्तरःजेम कोई मनुष्यने मनुष्यपर्याय नाश थवाना कारणरूप तीव्ररोग प्रगट
थयो होय तेने मनुष्यपर्याय छोडवावाळो कहीए छीए पण मनुष्यपणुं दूर थतां देवादिपर्याय
थाय छे ते तो आ रोग अवस्थामां थई नथी, अहीं तो मनुष्यनुं ज आयुष्य छे; तेम
सम्यग्द्रष्टिने सम्यक्त्वना नाशना कारण अनंतानुबंधीनो उदय थयो होय तेने सम्यक्त्वनो
विराधक सासादनी कह्यो, पण सम्यक्त्वनो अभाव थतां मिथ्यात्व थाय छे ते अभाव तो आ
सासादनमां थयो नथी, अहीं तो उपशमसम्यक्त्वनो ज काळ छे
एम जाणवुं.
ए प्रमाणे सम्यक्त्वना सद्भावमां अनंतानुबंधी चोकडीनी व्यवस्था थाय छे माटे सात
प्रकृतिओना उपशमादिकथी पण सम्यक्त्वनी प्राप्ति कहीए छीए.
प्रश्नःतो सम्यक्त्वमार्गणाना छ भेद कर्या ते केवी रीते?
उत्तरःसम्यक्त्वना तो त्रण ज भेद छे, परंतु सम्यक्त्वना अभावरूप मिथ्यात्व,
ए बंनेनो मिश्रभाव ते मिश्र, तथा सम्यक्त्वनो घातकभाव ते सासादन. ए प्रमाणे सम्यक्त्व-
मार्गणाथी जीवनो विचार करतां छ भेद कह्या छे.
अहीं कोई कहे के‘सम्यक्त्वथी भ्रष्ट थई मिथ्यात्वमां आव्यो होय तेने मिथ्यात्व-
सम्यक्त्व कहेवाय’ एम कहेवुं ए तो असत्य छे, कारण केअभव्यने पण तेनो सद्भाव
होय छे. वळी मिथ्यात्वसम्यक्त्व कहेवुं ए ज अशुद्ध छे. जेम संयममार्गणामां असंयम कह्या
छे तथा भव्यमार्गणामां अभव्य कह्या छे, ते ज प्रमाणे अहीं सम्यक्त्वमार्गणामां मिथ्यात्व
कह्युं छे, पण त्यां मिथ्यात्वने सम्यक्त्वनो भेद न समजवो. सम्यक्त्वनी अपेक्षाए विचार करतां
केटलाक जीवोने सम्यक्त्वना अभावथी मिथ्यात्व होय छे एवो अर्थ प्रगट करवा अर्थे