रहस्यपूर्ण चिठ्ठी ][ ३५३
अनुभवमां आत्मा प्रत्यक्षनी माफक यथार्थ प्रतिभासे छे, तेथी आ न्याये आत्मानुं पण प्रत्यक्ष
जाणवुं होय छे एम कहीए तो दोष नथी. कथन तो अनेक प्रकारनां होय छे; ते सर्व आगम –
अध्यात्मशास्त्रोथी जेम विरोध न आवे तेम विवक्षाभेदवडे जाणवां.
प्रश्नः — एवो अनुभव कया गुणस्थानमां थाय छे?
समाधानः — चोथा गुणस्थानथी ज थाय छे. परंतु चोथामां तो घणा काळनां
अंतरालथी थाय छे अने उपरना गुणस्थानोमां शीघ्र शीघ्र थाय छे.
प्रश्नः — अनुभव तो निर्विकल्प छे, त्यां उपरना अने नीचेना गुण-
स्थानोमां भेद शो?
उत्तरः — परिणामोनी मग्नतामां विशेष छे; जेम बे पुरुष नाम ले छे अने बंनेना
परिणाम नाम विषे छे; त्यां एकने तो मग्नता विशेष छे तथा बीजाने थोडी छे, तेम आमां
पण जाणवुं.
प्रश्नः — जो निर्विकल्प अनुभवमां कोई विकल्प नथी तो शुक्लध्याननो
प्रथम भेद (जे) पृथक्त्ववितर्कविचार कह्यो छे, तेमां ‘पृथक्त्ववितर्क’ —
नानाप्रकारना श्रुतनो ‘विचार’ — अर्थ – व्यंजन – योग – संक्रमण – एम केम कह्युं?
उत्तरः — कथन बे प्रकारे होय छेः एक स्थूळरूप छे अने बीजुं सूक्ष्मरूप छे.
जेम स्थूळरूपे तो छठ्ठा गुणस्थानमां संपूर्ण ब्रह्मचर्यव्रत कह्युं, पण सूक्ष्मताए नवमा गुणस्थान
सुधी मैथुनसंज्ञा कही; तेम अहीं अनुभवमां निर्विकल्पता स्थूळरूपे कही छे. तथा सूक्ष्मताथी
पृथक्त्ववितर्कविचारादि भेद वा कषायादिक दशमा गुणस्थान सुधी कह्यां छे त्यां पोताना तथा
अन्यना जाणवामां आवी शके एवा भावनुं कथन स्थूळ जाणवुं, अने जे पोते पण न
जाणी शके, (मात्र) केवळी भगवान ज जाणी शके एवा भावोनुं कथन सूक्ष्म जाणवुं.
चरणानुयोगआदिमां स्थूळ कथननी मुख्यता छे अने करणानुयोगमां सूक्ष्म कथननी मुख्यता छे,
एवा भेद अन्य ठेकाणे पण जाणवा.
ए प्रमाणे निर्विकल्प अनुभवनुं स्वरूप जाणवुं.
वळी भाईश्री! तमे त्रण द्रष्टांत लख्यां अथवा द्रष्टांत द्वारा प्रश्न लख्या, पण द्रष्टांत
सर्वांग मळतां आवे नहि. द्रष्टांत छे ते एक प्रयोजन दर्शावे छे. अहीं बीजनो चन्द्र,
जळबिन्दु, अग्निकण — ए तो एकदेश छे अने पूर्णिमानो चन्द्र, महासागर तथा अग्निकुंड –
ए सर्वदेश छे, ए ज प्रमाणे चोथा गुणस्थानमां आत्माने ज्ञानादिगुणो एकदेश प्रगट थया
छे तथा तेरमा गुणस्थानमां आत्माने ज्ञानादिगुणो सर्वथा प्रगट थाय छे अने जेम द्रष्टांतोनी