Moksha Marg Prakashak-Gujarati (Devanagari transliteration).

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३५४ ][ मोक्षमार्गप्रकाशक
एक जाति छे, तेम ज जेटला गुण अव्रत सम्यग्द्रष्टिने प्रगट थया छे तेनी अने तेरमा
गुणस्थानमां जे गुण प्रगट थाय छे तेनी एक जाति छे.
प्रश्नःजो एक जाति छे तो जेम केवळी सर्व ज्ञेयने प्रत्यक्ष जाणे
छे तेम चोथा गुणस्थानवाळो जीव पण आत्माने प्रत्यक्ष जाणतो हशे?
उत्तरःभाईश्री! प्रत्यक्षतानी अपेक्षाए एक जाति नथी पण सम्यग्ज्ञाननी
अपेक्षाए एक जाति छे. चोथा गुणस्थानवाळाने मतिश्रुतरूप सम्यग्ज्ञान छे, अने तेरमा
गुणस्थानवाळाने केवळरूप सम्यग्ज्ञान छे. वळी एकदेश सर्वदेशनुं अंतर तो एटलुं ज छे के
मति
श्रुतज्ञानवाळा अमूर्तिक वस्तुने अप्रत्यक्ष अने मूर्तिक वस्तुने पण प्रत्यक्ष वा अप्रत्यक्ष,
किंचित्, अनुक्रमथी जाणे छे तथा केवळज्ञानी सर्व वस्तुने सर्वथा युगपत् जाणे छे. प्रथमनो
परोक्षरूपे जाणे छे अने बीजो प्रत्यक्षरूपे जाणे छे, एटलो ज तेमां विशेष (भेद) छे, वळी
जो सर्वथा (ए बन्ने ज्ञाननी) एक ज जाति कहीए तो जेम केवळज्ञानी युगपत् प्रत्यक्ष
अप्रयोजनरूप ज्ञेयने निर्विकल्परूपे जाणे छे तेम ए (मति-श्रुतसम्यग्ज्ञानी) पण जाणे, पण
एम तो नथी, तेथी प्रत्यक्ष
परोक्षनो विशेष (भेद) जाणवो. कह्युं छे केः
स्याद्वादकेवलज्ञाने सर्वतत्त्वप्रकाशने
भेदः साक्षादसाक्षाच्च ह्यवस्त्वन्यतमं भवेत् ।।
(अष्टसहस्त्रीदशमःपरिच्छेद१०५)
अर्थःस्याद्वाद अर्थात् श्रुतज्ञान अने केवळज्ञानए बन्ने सर्व तत्त्वोने प्रकाशनारां
छे, भेद एटलो ज के केवळज्ञान प्रत्यक्ष छे, श्रुतज्ञान परोक्ष छे. परंतु वस्तु छे ते अन्यरूपे
नथी.
वळी तमे निश्चय सम्यक्त्वनुं अने व्यवहारसम्यक्त्वनुं स्वरूप लख्युं ते सत्य छे. परंतु
एटलुं जाणवुं के सम्यक्त्वीने व्यवहारसम्यक्त्वमां वा अन्य काळमां अंतरंग निश्चयसम्यक्त्व
गर्भित छे, निरंतर गमन (परिणमन) रूप रहे छे.
वळी तमे लख्युं के कोई साधर्मी कहे छे केःआत्माने प्रत्यक्ष जाणे तो
कर्मवर्गणाओने प्रत्यक्ष केम न जाणे?
ए ज कह्युं छे के आत्माने प्रत्यक्ष तो केवळी ज जाणे छे, कर्मवर्गणाने अवधिज्ञान
पण जाणे छे.
वळी तमे लख्युं छे के ‘बीजना चंद्रनी जेम आत्माना प्रदेश थोडा खुल्ला छे एम
कहो.’