रहस्यपूर्ण चिठ्ठी ][ ३५५
उत्तरः — ए द्रष्टांत प्रदेशनी अपेक्षाए नथी पण गुणनी अपेक्षाए छे.
ए प्रमाणे सम्यक्त्वी संबंधी तथा अनुभव संबंधी प्रत्यक्ष – अप्रत्यक्षादिकना जे प्रश्नो
तमे लख्या हता तेनो प्रत्युत्तर मारी बुद्धि अनुसार लख्यो छे. तमे पण जिनवाणीथी तथा
पोतानी परिणतिथी मेळवी लेशो.
अने भाईश्री, विशेष क्यां सुधी लखीए? जे वात जाणवामां आवे ते लखवामां आवी
शके नहि. मळ्येथी कंईक कही शकाय; परंतु मळवुं कर्माधीन छे. माटे सारुं तो ए छे के
चैतन्यस्वरूपना अनुभवना उद्यमी रहेवुं.
वर्तमानकाळमां अध्यात्मतत्त्व तो आत्मख्याति – समयसार ग्रंथनी श्री अमृतचंद्र
आचार्यकृत टीकामां छे अने आगमनी चर्चा गोम्मटसारमां छे तथा बीजा पण अन्य ग्रंथोमां
छे.
जे जाणी छे ते सर्व लखवामां आवे नहि; तेथी तमे पण अध्यात्म तथा आगमग्रंथोनो
अभ्यास राखजो अने स्वरूपानंदमां मग्न रहेजो.
वळी तमे कोई विशेष ग्रंथ जाण्या होय तो मने लखी मोकलजो; स्वधर्मीने तो परस्पर
(धर्म) चर्चा ज जोईए; वळी मारी तो एटली बुद्धि छे नहि, परंतु तमारा जेवा भाईओथी
परस्पर विचार छे, ते मोटी वात छे.
ज्यां सुधी मळवुं थाय नहि त्यां सुधी पत्र तो अवश्य लख्या करो.
मिति फागण वद
५ संवत १८११.
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— टोडरमल.