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परिशिष्ट ३
परमार्थवचनिका
[कविवर पं० बनारसीदासजी रचित]
एक जीव द्रव्य, तेना अनंत गुण, अनंत पर्याय, एक एक गुणना असंख्यात प्रदेश,
एक एक प्रदेशविषे अनंत कर्मवर्गणा, एक एक कर्मवर्गणाविषे अनंत – अनंत पुद्गलपरमाणु,
एक एक पुद्गलपरमाणु अनंत गुण, अनंत पर्यायसहित विराजमान छे.
आ प्रमाणे एक संसारावस्थित जीवपिंडनी अवस्था छे; ए ज प्रमाणे अनंत जीवद्रव्य
सपिंडरूप जाणवा. एक जीवद्रव्य अनंत अनंत पुद्गलद्रव्यथी संयोगित (संयुक्त) मानवुं.
तेनुं विवरणः — जुदा जुदा रूपे जीवद्रव्यनी परिणति तथा जुदा जुदा रूपे
पुद्गलद्रव्यनी परिणति छे.
तेनुं विवरणः — एक जीवद्रव्य जे प्रकारनी अवस्थासहित नाना आकाररूप परिणमे
ते प्रकार अन्य जीवथी मळतो आवे नहि; तेनो बीजो प्रकार छे. (अर्थात् अन्य जीवनुं तेनाथी
अन्य अवस्थारूप परिणमन होय.) ए प्रमाणे अनंतानंतस्वरूप जीवद्रव्य अनंतानंतस्वरूप
अवस्थासहित वर्ती रह्यां छे. कोई जीवद्रव्यना परिणाम कोईपण अन्य जीवद्रव्यथी मळता आवे
नहि. ए ज प्रमाणे एक पुद्गलपरमाणु एक समयमां जे प्रकारनी अवस्था धारण करे ते
अवस्था अन्य पुद्गलपरमाणु द्रव्यथी मळती आवे नहि. तेथी पुद्गल (परमाणु) द्रव्यनी पण
अन्यअन्यता जाणवी.
हवे जीवद्रव्य, पुद्गलद्रव्य एकक्षेत्रावगाही अनादिकाळथी छे; तेमां विशेष एटलुं के
जीवद्रव्य एक अने पुद्गलपरमाणु द्रव्य अनंतानंत, चलाचलरूप, आगमनगमनरूप, अनंताकार
परिणमनरूप, बंध-मुक्तिशक्तिसहित वर्ते छे.
हवे जीवद्रव्यनी अनंती अवस्था; तेमां त्रण अवस्था मुख्य स्थापी. एक अशुद्धअवस्था,
बीजी शुद्धाशुद्धरूप मिश्रअवस्था तथा त्रीजी शुद्धअवस्था. ए त्रणे अवस्था संसारी जीवद्रव्यनी
जाणवी. संसारातीत सिद्धने अनवस्थितरूप कहीए छीए.
— हवे त्रणे अवस्था संबंधी विचारः — एक अशुद्धनिश्चयात्मक द्रव्य, बीजुं
मिश्रनिश्चयात्मक द्रव्य अने त्रीजुं शुद्धनिश्चयात्मक द्रव्य छे. अशुद्धनिश्चयात्मक द्रव्यने सहकारी
अशुद्धव्यवहार छे; मिश्रनिश्चयात्मक द्रव्यने सहकारी मिश्रव्यवहार छे; तथा शुद्धनिश्चयात्मक
द्रव्यने सहकारी शुद्धव्यवहार छे.