परमार्थवचनिका ][ ३५७
निश्चय अने व्यवहारनुं विवरण
निश्चय तो अभेदरूप द्रव्य तथा व्यवहार द्रव्यना यथास्थित भाव छे. परंतु विशेष एटलुं
के – ज्यांसुधी संसारावस्था छे त्यांसुधी व्यवहार कहेवाय. सिद्धने व्यवहारातीत कहेवाय. तेथी
संसार, व्यवहार ए बन्ने एकरूप कह्या अर्थात् संसारी ते व्यवहारी, व्यवहारी ते संसारी. हवे —
ए त्रणे अवस्थानुं विवरण
ज्यांसुधी मिथ्यात्व अवस्था छे त्यांसुधी अशुद्धनिश्चयात्मक द्रव्य अशुद्धव्यवहारी छे.
सम्यग्द्रष्टि थतां ज मात्र चतुर्थ गुणस्थानकथी मांडी बारमा गुणस्थानक सुधी मिश्रनिश्चयात्मक
जीवद्रव्य मिश्रव्यवहारी छे; अने केवलज्ञानी शुद्धनिश्चयात्मक शुद्धव्यवहारी छे.
निश्चय तो द्रव्यनुं स्वरुप अने व्यवहार
संसारावस्थित भाव, तेनुं विवरण
मिथ्याद्रष्टि जीव पोतानुं स्वरूप जाणतो नथी तेथी परस्वरूप विषे मग्न बनी परकार्यने
तथा परस्वरूपने पोतानां माने छे, ते कार्य करतो होवाथी ते अशुद्धव्यवहारी कहेवाय.
सम्यग्द्रष्टि पोतानुं स्वरूप परोक्षप्रमाणवडे अनुभवे छे, परसत्ता अने परस्वरूपने
पोतानुं कार्य नहि मानतो थको योगद्वारवडे पोताना स्वरूपना ध्यान – विचाररूप क्रिया करे छे,
ते कार्य करतां ते मिश्रव्यवहारी कहेवाय.
केवळज्ञानी (जीव) यथाख्यातचारित्रना बळवडे शुद्धात्मस्वरूपमां रमणशील छे तेथी
ते शुद्धव्यवहारी कहेवाय. तेनामां योगारूढ अवस्था विद्यमान छे तेथी तेने व्यवहारी नाम
कह्यो. शुद्धव्यवहारनी मर्यादा तेरमा गुणस्थानथी मांडी चौदमा गुणस्थान सुधी जाणवी. यथा
असिद्धत्वपरिणमनत्वात् व्यवहारः।
हवे त्रणे व्यवहारनुं स्वरुप
अशुद्धव्यवहार शुभाशुभाचाररूप छे, शुद्धाशुद्धव्यवहार शुभोपयोगमिश्रित स्वरूपा-
चरणरूप छे, अने शुद्धव्यवहार शुद्धस्वरूपाचरणरूप छे.
परंतु विशेष तेनुं एटलुं छेः — कोई कहे के शुद्धस्वरूपाचरणात्म तो सिद्धमां पण
विद्यमान छे, तेथी त्यां पण व्यवहार संज्ञा कहेवी जोईए; ते तेम नथी केमके संसार अवस्था
सुधी व्यवहार कहीए छीए, संसारावस्था मटतां व्यवहार पण मट्यो कहेवाय, अहीं ए
स्थापना करी छे तेथी सिद्ध व्यवहारातीत कहेवाय.
आ रीते व्यवहारविचार समाप्त.