३५८ ][ मोक्षमार्गप्रकाशक
आगम – अधयात्मनुं स्वरुप
वस्तुनो जे स्वभाव तेने आगम कहीए छीए, आत्मानो जे अधिकार तेने अध्यात्म
कहीए छीए. आगम तथा अध्यात्मस्वरूप भाव आत्मद्रव्यना जाणवा. ते बन्ने भाव
संसारअवस्थाविषे त्रिकालवर्ती मानवा.
तेनुं विवरणः — आगमरूप कर्मपद्धति छे; अध्यात्मस्वरूप शुद्धचेतनापद्धति छे.
तेनुं विवेचनः — कर्मपद्धति पौद्गलिक द्रव्यरूप अथवा भावरूप छे. द्रव्यरूप तो
पुद्गलना परिणाम छे. भावरूप पुद्गलाकार आत्मानी अशुद्धपरिणतिरूप परिणाम छे; — ते
बंने परिणाम आगमरूप स्थाप्या. हवे शुद्धचेतनापद्धति — शुद्धात्मपरिणाम, ते पण द्रव्यरूप तथा
भावरूप एम बे प्रकारे छे. द्रव्यरूप तो जीवत्वपरिणाम छे; तथा भावरूप ज्ञान, दर्शन, सुख,
वीर्य आदि अनंतगुणपरिणाम छे. ए बन्ने परिणाम अध्यात्मरूप जाणवा.
ए आगम तथा अध्यात्म बन्ने पद्धतिमां अनंतता मानवी.
अनंतता कही तेनो विचार
अनंततानुं स्वरूप द्रष्टांतवडे दर्शावे छे, जेमकेः — वडना झाडनुं एक बीज हाथमां लेवुं,
ते उपर दीर्घद्रष्टिथी विचार करे तो ते वडना बीजमां एक वडनुं झाड छे, भाविकाळमां जेवुं
थनार छे तेवा विस्तारसहित ते वृक्षनुं वास्तव्य स्वरूप विद्यमान बीजमां छतुं छे. अनेक शाखा,
प्रशाखा, पत्र, पुष्प, फळयुक्त छे. तेना प्रत्येक फळमां एवां अनेक बीज छे.
ए प्रकारनी अवस्था एक वडना बीज संबंधी विचारीए. वळी फरी सूक्ष्मद्रष्टिथी
जोईए तो ते वडना वृक्षमां जे जे बीजो छे ते ते बीजो (एवां बीजां) अंतर्गर्भित
वडवृक्षसंयुक्त होय छे. ए ज रीते एक वडमां अनेक अनेक बीज अने एकेक बीजमां एकेक
वडवृक्ष छे. तेनो (दीर्घ) विचार करीए तो भाविनयप्रमाणथी न वडवृक्षनी मर्यादा पमाय के
न बीजनी मर्यादा पमाय.
ए प्रमाणे अनंततानुं स्वरूप जाणवुं.
ते अनंतताना स्वरूपने केवळज्ञानी पुरुष पण अनंत ज देखे, जाणे, कहे; अनंतनो बीजो
अंत छे ज नहि के जे ज्ञानमां (अंतरूपे) भासे. तेथी अनंतता अनंतरूप ज प्रतिभासे छे.
ए प्रमाणे आगम, अध्यात्मनी अनंतता जाणवी.
तेमां विशेष एटलुं के अध्यात्मनुं स्वरूप अनंत छे अने आगमनुं स्वरूप अनंतानंतरूप
छे. कारण के यथार्थ प्रमाणथी अध्यात्म एक द्रव्याश्रित, अने आगम अनंतानंत पुद्गल-
द्रव्याश्रित छे.