Niyamsar-Gujarati (Devanagari transliteration). Shlok: 84 Gatha: 62.

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कहानजैनशास्त्रमाळा ]
व्यवहारचारित्र अधिकार
[ ११९
(आर्या)
निश्चयरूपां समितिं सूते यदि मुक्ति भाग्भवेन्मोक्षः
वत न च लभतेऽपायात् संसारमहार्णवे भ्रमति ।।८४।।
पेसुण्णहासकक्कसपरणिंदप्पप्पसंसियं वयणं
परिचत्ता सपरहिदं भासासमिदी वदंतस्स ।।६२।।
पैशून्यहास्यकर्कशपरनिन्दात्मप्रशंसितं वचनम्
परित्यज्य स्वपरहितं भाषासमितिर्वदतः ।।६२।।

अत्र भाषासमितिस्वरूपमुक्त म्

कर्णेजपमुखविनिर्गतं नृपतिकर्णाभ्यर्णगतं चैकपुरुषस्य एककुटुम्बस्य एकग्रामस्य वा महद्विपत्कारणं वचः पैशून्यम् क्वचित् कदाचित् किंचित् परजनविकाररूपमवलोक्य त्वाकर्ण्य च हास्याभिधाननोकषायसमुपजनितम् ईषच्छुभमिश्रितमप्यशुभकर्मकारणं

[श्लोकार्थः] जो जीव निश्चयरूप समितिने उत्पन्न करे, तो ते मुक्तिने पामे छेमोक्षरूप थाय छे. परंतु समितिना नाशथी (-अभावथी), अरेरे! ते मोक्ष पामतो नथी, पण संसाररूपी महासागरमां भमे छे. ८४.

निजस्तवन, परनिंदा, पिशुनता, हास्य, कर्कश वचनने
छोडी स्वपरहित जे वदे, भाषासमिति तेहने. ६२.

अन्वयार्थः[पैशून्यहास्यकर्कशपरनिन्दात्मप्रशंसितं वचनम्] पैशून्य (चाडी), हास्य, कर्कश भाषा, परनिंदा अने आत्मप्रशंसारूप वचनो [परित्यज्य] परित्यागीने [स्वपरहितं वदतः] जे स्वपरहितरूप वचनो बोले छे, तेने [भाषासमितिः] भाषासमिति होय छे.

टीकाःअहीं भाषासमितिनुं स्वरूप कह्युं छे.

चाडीखोर माणसना मुखमांथी नीकळेलां अने राजाना काननी निकट पहोंचेलां, कोई एक पुरुष, कोई एक कुटुंब के कोई एक गामने महा विपत्तिना कारणभूत एवां वचनो ते पैशून्य छे. क्यांक क्यारेक कांईक परजनोना विकृत रूपने अवलोकीने अथवा सांभळीने हास्य नामना नोकषायथी उत्पन्न थतुं, जराक शुभ साथे मिश्रित होवा छतां