Niyamsar-Gujarati (Devanagari transliteration). Shlok: 93 Gatha: 69.

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नियमसार
[ भगवानश्रीकुंदकुंद-

अत्र कायगुप्तिस्वरूपमुक्त म्

कस्यापि नरस्य तस्यान्तरंगनिमित्तं कर्म, बंधनस्य बहिरंगहेतुः कस्यापि कायव्यापारः छेदनस्याप्यन्तरंगकारणं कर्मोदयः, बहिरंगकारणं प्रमत्तस्य कायक्रिया मारणस्याप्यन्तरङ्गहेतुरांतर्यक्षयः, बहिरङ्गकारणं कस्यापि कायविकृतिः आकुंचन- प्रसारणादिहेतुः संहरणविसर्पणादिहेतुसमुद्घातः एतासां कायक्रियाणां निवृत्तिः काय- गुप्तिरिति

(अनुष्टुभ्)
मुक्त्वा कायविकारं यः शुद्धात्मानं मुहुर्मुहुः
संभावयति तस्यैव सफलं जन्म संसृतौ ।।9।।
जा रायादिणियत्ती मणस्स जाणीहि तं मणोगुत्ती
अलियादिणियत्तिं वा मोणं वा होइ वइगुत्ती ।।9।।

[कायक्रियानिवृत्तिः] कायक्रियाओनी निवृत्तिने [कायगुप्तिः इति निर्दिष्टा] कायगुप्ति कही छे.

टीकाःअहीं कायगुप्तिनुं स्वरूप कह्युं छे.

कोई पुरुषने बंधननुं अंतरंग निमित्त कर्म छे, बंधननो बहिरंग हेतु कोईनो कायव्यापार छे; छेदननुं पण अंतरंग कारण कर्मोदय छे, बहिरंग कारण प्रमत्त जीवनी कायक्रिया छे; मारणनो पण अंतरंग हेतु आंतरिक (निकट) संबंधनो (आयुष्यनो) क्षय छे, बहिरंग कारण कोईनी कायविकृति छे; आकुंचन, प्रसारण वगेरेनो हेतु संकोच- विस्तारादिकना हेतुभूत समुद्घात छे.आ कायक्रियाओनी निवृत्ति ते कायगुप्ति छे.

[हवे ६८मी गाथानी टीका पूर्ण करतां टीकाकार मुनिराज श्लोक कहे छेः]

[श्लोकार्थः] कायविकारने छोडीने जे फरीफरीने शुद्धात्मानी संभावना (सम्यक् भावना) करे छे, तेनो ज जन्म संसारमां सफळ छे. ९३.

मनमांथी जे रागादिनी निवृत्ति ते मनगुप्ति छे;
अलीकादिनी निवृत्ति अथवा मौन वाचागुप्ति छे. ६९.

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