हेयोपादेयत्यागोपादानलक्षणकथनमिदम् ।
ये केचिद् विभावगुणपर्यायास्ते पूर्वं व्यवहारनयादेशादुपादेयत्वेनोक्ताः शुद्ध- निश्चयनयबलेन हेया भवन्ति । कुतः ? परस्वभावत्वात्, अत एव परद्रव्यं भवति । सकलविभावगुणपर्यायनिर्मुक्तं शुद्धान्तस्तत्त्वस्वरूपं स्वद्रव्यमुपादेयम् । अस्य खलु सहज- ज्ञानसहजदर्शनसहजचारित्रसहजपरमवीतरागसुखात्मकस्य शुद्धान्तस्तत्त्वस्वरूपस्याधारः सहज- परमपारिणामिकभावलक्षणकारणसमयसार इति ।
तथा चोक्तं श्रीमदमृतचन्द्रसूरिभिः —
शुद्धं चिन्मयमेकमेव परमं ज्योतिः सदैवास्म्यहम् ।
स्तेऽहं नास्मि यतोऽत्र ते मम परद्रव्यं समग्रा अपि ।।’’
टीका : — यह, हेय-उपादेय अथवा त्याग-ग्रहणके स्वरूपका कथन है ।
जो कोई विभावगुणपर्यायें हैं वे पहले (४९वीं गाथामें) व्यवहारनयके कथन द्वारा उपादेयरूपसे कही गई थीं किन्तु शुद्धनिश्चयनयके बलसे (शुद्धनिश्चयनयसे) वे हेय हैं । किस कारणसे ? क्योंकि वे परस्वभाव हैं, और इसीलिये परद्रव्य हैं । सर्व विभावगुणपर्यायोंसे रहित शुद्ध-अन्तस्तत्त्वस्वरूप स्वद्रव्य उपादेय है । वास्तवमें सहजज्ञान – सहजदर्शन – सहजचारित्र – सहजपरमवीतरागसुखात्मक शुद्ध-अन्तस्तत्त्वस्वरूप इस स्वद्रव्यका आधार सहजपरमपारिणामिकभावलक्षण ( – सहज परम पारिणामिक भाव जिसका लक्षण है ऐसा) कारणसमयसार है ।
इसीप्रकार (आचार्यदेव) श्रीमद् अमृतचन्द्रसूरिने (श्री समयसारकी आत्मख्याति नामक टीकामें १८५वें श्लोक द्वारा) कहा है कि : —
‘‘[श्लोेकार्थ : — ] जिनके चित्तका चरित्र उदात्त ( – उदार, उच्च, उज्ज्वल) है ऐसे मोक्षार्थी इस सिद्धान्तका सेवन करो कि — ‘मैं तो शुद्ध चैतन्यमय एक परम ज्योति ही सदैव हूँ; और यह जो भिन्न लक्षणवाले विविध प्रकारके भाव प्रगट होते हैं वह मैं नहीं हूँ, क्योंकि वे सब मुझे परद्रव्य हैं ।’’