परिणामं समतावलंबनं कृत्वा परमसंयमीभूत्वा तिष्ठति; तदेवालोचनास्वरूपमिति हे शिष्य
त्वं जानीहि परमजिननाथस्योपदेशात् इत्यालोचनाविकल्पेषु प्रथमविकल्पोऽयमिति ।
यो मुक्ति श्रीविलासानतनुसुखमयान् स्तोककालेन याति ।
तं वंदे सर्ववंद्यं सकलगुणनिधिं तद्गुणापेक्षयाहम् ।।१५४।।
ज्ञानज्योतिःप्रहतदुरितध्वान्तपुंजः पुराणः ।
निजबोधके स्थानभूत कारणपरमात्माको निरवशेषरूपसे अन्तर्मुख निज स्वभावनिरत सहज – अवलोकन द्वारा निरंतर देखता है (अर्थात् जो जीव कारणपरमात्माको सर्वथा अन्तर्मुख ऐसा जो निज स्वभावमें लीन सहज - अवलोकन उसके द्वारा निरंतर देखता है — अनुभवता है ); क्या करके देखता है ? पहले निज परिणामको समतावलम्बी करके, परमसंयमीभूतरूपसे रहकर देखता है; वही आलोचनाका स्वरूप है ऐसा, हे शिष्य ! तू परम जिननाथके उपदेश द्वारा जान । — ऐसा यह, आलोचनाके भेदोंमें प्रथम भेद हुआ ।
[अब इस १०९वीं गाथाकी टीका पूर्ण करते हुए टीकाकार मुनिराज छह श्लोक कहते हैं : ]
[श्लोकार्थ : — ] इसप्रकार जो आत्मा आत्माको आत्मा द्वारा आत्मामें अविचल निवासवाला देखता है, वह अनंग - सुखमय (अतीन्द्रिय आनन्दमय) ऐसे मुक्तिलक्ष्मीके विलासोंको अल्प कालमें प्राप्त करता है । वह आत्मा सुरेशोंसे, संयमधरोंकी पंक्तियोंसे, खेचरोंसे ( – विद्याधरोंसे) तथा भूचरोंसे ( – भूमिगोचरियोंसे) वंद्य है । मैं उस सर्ववंद्य सकलगुणनिधिको ( – सर्वसे वंद्य ऐसे समस्त गुणोंके भण्डारको) उसके गुणोंकी अपेक्षासे ( – अभिलाषासे) वंदन करता हूँ ।१५४।
[श्लोकार्थ : — ] जिसने ज्ञानज्योति द्वारा पापतिमिरके पुंजका नाश किया है और
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