तद्धेतुभूतसुकृतासुकृतप्रणाशात् ।
मुक्त्वा मुमुक्षुपथमेकमिह व्रजामि ।।१६५।।
शुभमशुभसुकर्म प्रस्फु टं तद्विदित्वा ।
तमहमभिनमामि प्रत्यहं भावयामि ।।१६८।।
होनेवाले इस लोकमें यह मुनिवर समताके प्रमादसे शमामृतमय जो हिम - राशि (बफ र्का ढेर) उसे प्राप्त करते हैं ।१६४।
[श्लोकार्थ : — ] मुक्त जीव विभावसमूहको कदापि प्राप्त नहीं होता क्योंकि उसने उसके हेतुभूत सुकृत और दुष्कृतका नाश किया है । इसलिये अब मैं सुकृत और दुष्कृतरूपी कर्मजालको छोड़कर एक मुमुक्षुमार्ग पर जाता हूँ [अर्थात् मुमुक्षु जिस मार्ग पर चले हैं उसी एक मार्ग पर चलता हूँ ] ।१६५।
[श्लोकार्थ : — ] पुद्गलस्कन्धों द्वारा जो अस्थिर है (अर्थात् पुद्गलस्कन्धोंके आने - जानेसे जो एक-सी नहीं रहती) ऐसी इस भवमूर्तिको ( – भवकी मूर्तिरूप कायाको) छोड़कर मैं सदाशुद्ध ऐसा जो ज्ञानशरीरी आत्मा उसका आश्रय करता हूँ । १६६ ।
[श्लोकार्थ : — ] शुभ और अशुभसे रहित शुद्धचैतन्यकी भावना मेरे अनादि संसाररोगकी उत्तम औषधि है ।१६७।
[श्लोकार्थ : — ] पाँच प्रकारके (द्रव्य, क्षेत्र, काल, भव और भावके