इह हि सकलकर्मनिर्मूलनसमर्थनिश्चयप्रायश्चित्तमुक्त म् ।
क्रोधादिनिखिलमोहरागद्वेषविभावस्वभावक्षयकारणनिजकारणपरमात्मस्वभावभावनायां सत्यां निसर्गवृत्त्या प्रायश्चित्तमभिहितम्, अथवा परमात्मगुणात्मकशुद्धान्तस्तत्त्वस्वरूप- सहजज्ञानादिसहजगुणचिंता प्रायश्चित्तं भवतीति ।
कामक्रोधाद्यन्यभावक्षये च ।
सन्तो जानन्त्येतदात्मप्रवादे ।।१८१।।
गाथा : ११४ अन्वयार्थ : — [क्रोधादिस्वकीयभावक्षयप्रभृतिभावनायां ] क्रोध आदि स्वकीय भावोंके ( – अपने विभावभावोंके) क्षयादिककी भावनामें [निर्ग्रहणम् ] रहना [च ] और [निजगुणचिन्ता ] निज गुणोंका चिंतन करना वह [निश्चयतः ] निश्चयसे [प्रायश्चित्तं भणितम् ] प्रायश्चित्त कहा है ।
टीका : — यहाँ (इस गाथामें) सकल कर्मोंको मूलसे उखाड़ देनेमें समर्थ ऐसा निश्चय - प्रायश्चित्त कहा गया है ।
क्रोधादिक समस्त मोहरागद्वेषरूप विभावस्वभावोंके क्षयके कारणभूत निज कारणपरमात्माके स्वभावकी भावना होने पर निसर्गवृत्तिके कारण (अर्थात् स्वाभाविक – सहज परिणति होनेके कारण) प्रायश्चित्त कहा गया है; अथवा, परमात्माके गुणात्मक ऐसे जो शुद्ध - अंतःतत्त्वरूप (निज) स्वरूपके सहजज्ञानादिक सहजगुण उनका चिंतन करना वह प्रायश्चित्त है ।
[अब इस ११४वीं गाथाकी टीका पूर्ण करते हुए टीकाकार मुनिराज श्लोक कहते हैं : ]
[श्लोकार्थ : — ] मुनियोंको कामक्रोधादि अन्य भावोंके क्षयकी जो संभावना
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