चतुष्कषायविजयोपायस्वरूपाख्यानमेतत् ।
जघन्यमध्यमोत्तमभेदात्क्षमास्तिस्रो भवन्ति । अकारणादप्रियवादिनो मिथ्याद्रष्टेरकारणेन मां त्रासयितुमुद्योगो विद्यते, अयमपगतो मत्पुण्येनेति प्रथमा क्षमा । अकारणेन संत्रासकरस्य ताडनवधादिपरिणामोऽस्ति, अयं चापगतो मत्सुकृतेनेति द्वितीया क्षमा । वधे सत्यमूर्तस्य अथवा तो अपने ज्ञानकी जो संभावना ( – सम्यक् भावना) वह उग्र प्रायश्चित्त कहा है । सन्तोंने आत्मप्रवादमें ऐसा जाना है (अर्थात् जानकर कहा है ) । १८१ ।
गाथा : ११५ अन्वयार्थ : — [क्रोधं क्षमया ] क्रोधको क्षमासे, [मानं स्वमार्दवेन ] मानको निज मार्दवसे, [मायां च आर्जवेन ] मायाको आर्जवसे [च ] तथा [लोभं संतोषेण ] लोभको संतोषसे — [चतुर्विधकषायान् ] इसप्रकार चतुर्विध कषायोंको [खलु जयति ] (योगी) वास्तवमें जीतते हैं ।
टीका : — यह, चार कषायों पर विजय प्राप्त करनेके उपायके स्वरूपका कथन है ।
जघन्य, मध्यम और उत्तम ऐसे (तीन) भेदोंके कारण क्षमा तीन (प्रकारकी) है । (१) ‘बिना-कारण अप्रिय बोलनेवाले मिथ्यादृष्टिको बिना-कारण मुझे त्रास देनेका उद्योग वर्तता है, वह मेरे पुण्यसे दूर हुआ;’ – ऐसा विचारकर क्षमा करना वह प्रथम क्षमा है । (२) ‘(मुझे) बिना-कारण त्रास देनेवालेको १ताड़नका और २वधका परिणाम वर्तता है, वह मेरे सुकृतसे दूर हुआ;’ — ऐसा विचारकर क्षमा करना वह द्वितीय क्षमा है । (३) वध
१ – ताड़न = मार मारना वह ।
२ – वध = मार डालना वह ।