Niyamsar (Hindi). Gatha: 115.

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कहानजैनशास्त्रमाला ]शुद्धनिश्चय-प्रायश्चित्त अधिकार[ २३१
कोहं खमया माणं समद्दवेणज्जवेण मायं च
संतोसेण य लोहं जयदि खु ए चहुविहकसाए ।।११५।।
क्रोधं क्षमया मानं स्वमार्दवेन आर्जवेन मायां च
संतोषेण च लोभं जयति खलु चतुर्विधकषायान् ।।११५।।

चतुष्कषायविजयोपायस्वरूपाख्यानमेतत

जघन्यमध्यमोत्तमभेदात्क्षमास्तिस्रो भवन्ति अकारणादप्रियवादिनो मिथ्याद्रष्टेरकारणेन मां त्रासयितुमुद्योगो विद्यते, अयमपगतो मत्पुण्येनेति प्रथमा क्षमा अकारणेन संत्रासकरस्य ताडनवधादिपरिणामोऽस्ति, अयं चापगतो मत्सुकृतेनेति द्वितीया क्षमा वधे सत्यमूर्तस्य अथवा तो अपने ज्ञानकी जो संभावना (सम्यक् भावना) वह उग्र प्रायश्चित्त कहा है सन्तोंने आत्मप्रवादमें ऐसा जाना है (अर्थात् जानकर कहा है ) १८१

गाथा : ११५ अन्वयार्थ :[क्रोधं क्षमया ] क्रोधको क्षमासे, [मानं स्वमार्दवेन ] मानको निज मार्दवसे, [मायां च आर्जवेन ] मायाको आर्जवसे [च ] तथा [लोभं संतोषेण ] लोभको संतोषसे[चतुर्विधकषायान् ] इसप्रकार चतुर्विध कषायोंको [खलु जयति ] (योगी) वास्तवमें जीतते हैं

टीका :यह, चार कषायों पर विजय प्राप्त करनेके उपायके स्वरूपका कथन है

जघन्य, मध्यम और उत्तम ऐसे (तीन) भेदोंके कारण क्षमा तीन (प्रकारकी) है (१) ‘बिना-कारण अप्रिय बोलनेवाले मिथ्यादृष्टिको बिना-कारण मुझे त्रास देनेका उद्योग वर्तता है, वह मेरे पुण्यसे दूर हुआ;’ ऐसा विचारकर क्षमा करना वह प्रथम क्षमा है (२) ‘(मुझे) बिना-कारण त्रास देनेवालेको ताड़नका और वधका परिणाम वर्तता है, वह मेरे सुकृतसे दूर हुआ;’ऐसा विचारकर क्षमा करना वह द्वितीय क्षमा है (३) वध

अभिमान मार्दवसे तथा जीते क्षमासे क्रोधको
कौटिल्य आर्जवसे तथा संतोष द्वारा लोभको ।।११५।।

ताड़न = मार मारना वह

वध = मार डालना वह