श्रावकेषु जघन्याः षट्, मध्यमास्त्रयः, उत्तमौ द्वौ च, एते सर्वे शुद्धरत्नत्रयभक्तिं कुर्वन्ति । अथ भवभयभीरवः परमनैष्कर्म्यवृत्तयः परमतपोधनाश्च रत्नत्रयभक्तिं कुर्वन्ति । तेषां परम- श्रावकाणां परमतपोधनानां च जिनोत्तमैः प्रज्ञप्ता निर्वृतिभक्ति रपुनर्भवपुरंध्रिकासेवा भवतीति ।
भक्तिं कुर्यादनिशमतुलां यो भवच्छेददक्षाम् ।
भक्तो भक्तो भवति सततं श्रावकः संयमी वा ।।२२०।।
(विरुद्ध) निज परमात्मतत्त्वके सम्यक् श्रद्धान - अवबोध - आचरणस्वरूपशुद्धरत्नत्रय - परिणामोंका जो भजन वह भक्ति है; आराधना ऐसा उसका अर्थ है । ❃एकादशपदी श्रावकोंमें जघन्य छह हैं, मध्यम तीन हैं तथा उत्तम दो हैं । — यह सब शुद्धरत्नत्रयकी भक्ति करते हैं । तथा भवभयभीरु, परमनैष्कर्म्यवृत्तिवाले (परम निष्कर्म परिणतिवाले) परम तपोधन भी (शुद्ध) रत्नत्रयकी भक्ति करते हैं । उन परम श्रावकों तथा परम तपोधनोंको जिनवरोंकी कही हुई निर्वाणभक्ति — अपुनर्भवरूपी स्त्रीकी सेवा — वर्तती है ।
[अब इस १३४वीं गाथाकी टीका पूर्ण करते हुए टीकाकार मुनिराज श्री पद्मप्रभमलधारिदेव श्लोक कहते हैं : ]
[श्लोकार्थ : — ] जो जीव भवभयके हरनेवाले इस सम्यक्त्वकी, शुद्ध ज्ञानकी और चारित्रकी भवछेदक अतुल भक्ति निरन्तर करता है, वह कामक्रोधादि समस्त दुष्ट पापसमूहसे मुक्त चित्तवाला जीव — श्रावक हो अथवा संयमी हो — निरन्तर भक्त है, भक्त है । ।२२०। ❃एकादशपदी = जिनके ग्यारह पद (गुणानुसार भूमिकाएँ) हैं ऐसे । [श्रावकोंके निम्नानुसार ग्यारह पद
त्याग, (७) ब्रह्मचर्य, (८) आरम्भत्याग, (९) परिग्रहत्याग, (१०) अनुमतित्याग और (११) उद्दिष्टाहार-
त्याग । उनमें छठवें पद तक (छठवीं प्रतिमा तक) जघन्य श्रावक हैं, नौवें पद तक मध्यम श्रावक