Niyamsar (Hindi). Gatha: 137.

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नियमसार
[ भगवानश्रीकुंदकुंद-
संस्थाप्यानंदभास्वन्निरतिशयगृहं चिच्चमत्कारभक्त्या
प्राप्नोत्युच्चैरयं यं विगलितविपदं सिद्धिसीमन्तिनीशः
।।२२७।।
रायादीपरिहारे अप्पाणं जो दु जुंजदे साहू
सो जोगभत्तिजुत्तो इदरस्स य किह हवे जोगो ।।१३७।।
रागादिपरिहारे आत्मानं यस्तु युनक्ति साधुः
स योगभक्ति युक्त : इतरस्य च कथं भवेद्योगः ।।१३७।।

निश्चययोगभक्ति स्वरूपाख्यानमेतत

निरवशेषेणान्तर्मुखाकारपरमसमाधिना निखिलमोहरागद्वेषादिपरभावानां परिहारे निरुपमसहजज्ञानदर्शनचारित्ररूप, नित्य आत्मामें आत्माको वास्तवमें सम्यक् प्रकारसे स्थापित करके, यह आत्मा चैतन्यचमत्कारकी भक्ति द्वारा निरतिशय घरकोकि जिसमेंसे विपदाएँ दूर हुई हैं तथा जो आनन्दसे भव्य (शोभायमान) है उसेअत्यन्त प्राप्त करता है अर्थात् सिद्धिरूपी स्त्रीका स्वामी होता है २२७

गाथा : १३७ अन्वयार्थ :[यः साधु तु ] जो साधु [रागादिपरिहारे आत्मानं युनक्ति ] रागादिके परिहारमें आत्माको लगाता है (अर्थात् आत्मामें आत्माको लगाकर रागादिका त्याग करता है ), [सः ] वह [योगभक्तियुक्तः ] योगभक्तियुक्त (योगकी भक्तिवाला) है; [इतरस्य च ] दूसरेको [योगः ] योग [कथम् ] किसप्रकार [भवेत् ] हो सकता है ?

टीका :यह, निश्चययोगभक्तिके स्वरूपका कथन है

निरवशेषरूपसे अन्तर्मुखाकार (सर्वथा अंतर्मुख जिसका स्वरूप है ऐसी) परम समाधि द्वारा समस्त मोहरागद्वेषादि परभावोंका परिहार होने पर, जो साधुआसन्नभव्य निरतिशय = जिससे कोई बढ़कर नहीं है ऐसे; अनुत्तम; श्रेष्ठ; अद्वितीय

रागादिके परिहारमें जो साधु जोड़े आतमा
है योगकी भक्ति उसे; नहि अन्यको सम्भावना ।।१३७।।

२७४ ]