कहानजैनशास्त्रमाला ]जीव अधिकार[ २३ शुद्धनिश्चयेन सहजज्ञानादिपरमस्वभावगुणानामाधारभूतत्वात्कारणशुद्धजीवः । अयं चेतनः । अस्य चेतनगुणाः । अयममूर्तः । अस्यामूर्तगुणाः । अयं शुद्धः । अस्य शुद्धगुणाः । अयमशुद्धः । अस्याशुद्धगुणाः । पर्यायश्च । तथा गलनपूरणस्वभावसनाथः पुद्गलः । श्वेतादिवर्णाधारो मूर्तः । अस्य हि मूर्तगुणाः । अयमचेतनः । अस्याचेतनगुणाः । स्वभावविभावगतिक्रियापरिणतानां जीवपुद्गलानां स्वभावविभावगतिहेतुः धर्मः । स्वभावविभावस्थितिक्रियापरिणतानां तेषां स्थितिहेतुरधर्मः । पंचानामवकाशदान- चेतन है; इसके( – जीवके ) चेतन गुण हैं । यह अमूर्त है; इसके अमूर्त गुण हैं । यह शुद्ध है; इसके शुद्ध गुण हैं । यह अशुद्ध है; इसके अशुद्ध गुण हैं । पर्याय भी इसीप्रकार है ।
और, जो गलन - पूरणस्वभाव सहित है (अर्थात् पृथक् होने और एकत्रित होनेके स्वभाववाला है ) वह पुद्गल है । यह (पुद्गल) श्वेतादि वर्णोंके आधारभूत मूर्त है; इसके मूर्त गुण हैं । यह अचेतन है; इसके अचेतन गुण हैं ।
१स्वभावगतिक्रियारूप और विभावगतिक्रियारूप परिणत जीव - पुद्गलोंको स्वभावगतिका और विभावगतिका निमित्त सो धर्म है ।
२स्वभावस्थितिक्रियारूप और विभावस्थितिक्रियारूप परिणत जीव-पुद्गलोंको
अर्थात् कारण-अपेक्षासे शुद्ध अर्थात् शक्ति-अपेक्षासे शुद्ध । कार्यशुद्ध अर्थात् कार्य-अपेक्षासे शुद्ध
अर्थात् व्यक्ति-अपेक्षासे शुद्ध ।]
१ चौदहवें गुणस्थानके अन्तमें जीव ऊ र्ध्वगमनस्वभावसे लोकान्तमें जाता है वह जीवकी स्वभावगतिक्रिया
है और संसारावस्थामें कर्मके निमित्तसे गमन करता है वह जीवकी विभावगतिक्रिया है । एक पृथक्
परमाणु गति करता है वह पुद्गलकी स्वभावगतिक्रिया है और पुद्गलस्कन्ध गमन करता है वह पुद्गलकी
(स्कन्धके प्रत्येक परमाणुकी) विभावगतिक्रिया है । इस स्वाभाविक तथा वैभाविक गतिक्रियामें धर्मद्रव्य
निमित्तमात्र है ।
२- सिद्धदशामें जीव स्थिर रहता है वह जीवकी स्वाभाविक स्थितिक्रिया है और संसारदशामें स्थिर रहता है
वह जीवकी वैभाविक स्थितिक्रिया है । अकेला परमाणु स्थिर रहता है वह पुद्गलकी स्वाभाविक
स्थितिक्रिया है और स्कन्ध स्थिर रहता है वह पुद्गलकी (स्कन्धके प्रत्येक परमाणुकी) वैभाविक
स्थितिक्रिया है । इन जीव-पुद्गलकी स्वाभाविक तथा वैभाविक स्थितिक्रियामें अधर्मद्रव्य निमित्तमात्र है ।