हानिश्च नीयते । अशुद्धपर्यायो नरनारकादिव्यंजनपर्याय इति ।
सहजगुणमणीनामाकरं पूर्णबोधम् ।
हृदयसरसिजाते राजते कारणात्मा ।
भज भजसि निजोत्थं भव्यशार्दूल स त्वम् ।।२५।।
क्वचित्सहजपर्ययैः क्वचिदशुद्धपर्यायकैः ।
भाँति) हानि भी लगाई जाती है ।
अशुद्धपर्याय नर - नारकादि व्यंजनपर्याय है ।
[अब, १४वीं गाथाकी टीका पूर्ण करते हुए टीकाकार मुनिराज तीन श्लोक कहते हैं :]
[श्लोेकार्थ : — ] परभाव होने पर भी, सहजगुणमणिकी खानरूप तथा पूर्णज्ञानवाले शुद्ध आत्माको एकको जो तीक्ष्णबुद्धिवाला शुद्धदृष्टि पुरुष भजता है, वह पुरुष परमश्रीरूपी कामिनीका (मुक्तिसुन्दरीका) वल्लभ बनता है ।२४।
[श्लोेकार्थ : — ] इसप्रकार पर गुणपर्यायें होने पर भी, उत्तम पुरुषोंके हृदय- कमलमें कारण – आत्मा विराजमान है । अपनेसे उत्पन्न ऐसे उस परमब्रह्मरूप समयसारको — कि जिसे तू भज रहा है उसे — , हे भव्यशार्दूल (भव्योत्तम), तू शीघ्र भज; तू वह है ।२५।
[श्लोेकार्थ : — ] जीवतत्त्व क्वचित् सद्गुणों सहित ×विलसता है — दिखाई देता है, × विलसना = दिखाई देना; दिखना; झलकना; आविर्भूत होना; प्रगट होना ।
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