युक्तानां संसारिणां विभावगतिक्रियाहेतुश्च । यथोदकं पाठीनानां गमनकारणं तथा तेषां जीवपुद्गलानां गमनकारणं स धर्मः । सोऽयममूर्तः अष्टस्पर्शनविनिर्मुक्त : वर्णरसपंचकगंध- द्वितयविनिर्मुक्त श्च अगुरुकलघुत्वादिगुणाधारः लोकमात्राकारः अखण्डैकपदार्थः । सहभुवोः गुणाः, क्रमवर्तिनः पर्यायाश्चेति वचनादस्य गतिहेतोर्धर्मद्रव्यस्य शुद्धगुणाः शुद्धपर्याया भवन्ति । अधर्मद्रव्यस्य स्थितिहेतुर्विशेषगुणः । अस्यैव तस्य धर्मास्तिकायस्य गुणपर्यायाः सर्वे भवन्ति । आकाशस्यावकाशदानलक्षणमेव विशेषगुणः । इतरे धर्माधर्मयोर्गुणाः स्वस्यापि सद्रशा इत्यर्थः । लोकाकाशधर्माधर्माणां समानप्रमाणत्वे सति न ह्यलोकाकाशस्य ह्रस्वत्वमिति । हैं — ऐसे अयोगी भगवानको स्वभावगतिक्रियारूपसे परिणमित होने पर ❃
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वह धर्म उन जीव - पुद्गलोंको गमनका कारण (निमित्त) है । वह धर्म अमूर्त, आठ स्पर्श रहित, तथा पाँच वर्ण, पाँच रस और दो गंध रहित, अगुरुलघुत्वादि गुणोंके आधारभूत, लोकमात्र आकारवाला ( – लोकप्रमाण आकारवाला), अखण्ड एक पदार्थ है । ‘‘सहभावी गुण हैं और क्रमवर्ती पर्यायें हैं’’ ऐसा (शास्त्रका) वचन होनेसे गतिके हेतुभूत इस धर्मद्रव्यको शुद्ध गुण और शुद्ध पर्यायें होती हैं ।
अधर्मद्रव्यका विशेषगुण स्थितिहेतुत्व है । इस अधर्मद्रव्यके (शेष) गुण-पर्यायों जैसे उस धर्मास्तिकायके (शेष) सर्व गुण - पर्याय होते हैं ।
आकाशका, अवकाशदानरूप लक्षण ही विशेषगुण है । धर्म और अधर्मके शेष गुण आकाशके शेष गुणों जैसे भी हैं ।
— इसप्रकार (इस गाथाका) अर्थ है ।
(यहाँ ऐसा ध्यानमें रखना कि) लोकाकाश, धर्म और अधर्म समान प्रमाणवाले होनेसे कहीं अलोकाकाशको न्यूनता — छोटापन नहीं है ( – अलोकाकाश तो अनन्त है) ।
[अब ३०वीं गाथाकी टीका पूर्ण करते हुए टीकाकार मुनिराज श्लोक कहते हैं : ] ❃ – स्वभावगतिक्रिया तथा विभावगतिक्रियाका अर्थ पृष्ठ – २३ पर देखें ।
६४ ]
१ – अपक्रमका अर्थ देखो पृष्ठ ६३में फु टनोट ।