Padmanandi Panchvinshati-Gujarati (Devanagari transliteration). Shlok: 62-107 (1. Dharmopadeshamrut).

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समस्त पदार्थोने देखवामां समर्थ करी दे छे ते उपाध्याय परमेष्ठी अमारी रक्षा करो. ६१.
(शार्दूलविक्रीडित)
उन्मुच्यालयबन्धनादपि द्रढात्काये ऽपि वीतस्पृहा
श्चित्ते मोहविकल्पजालमपि यद्दुर्भेद्यमन्तस्तमः
भेदायास्य हि साधयन्ति तदहो ज्योतिर्जितार्कप्रभं
ये सद्बोधमयं भवन्तु भवतां ते साधवः श्रेयसे
।।६२।।
अनुवाद : जे मजबूत गृहरूपी बंधनथी छूटीने पोताना शरीरना विषयमां
पण निस्पृह (ममत्वरहित) थई चुक्या छे तथा जे मनमां स्थित दुर्भेद्य (मुश्केलीथी
नष्ट कराय तेवुं) मोहजनित विकल्प समूहरूपी अभ्यंतर अंधकारने नष्ट करवा माटे
सूर्यना तेजने पण जीतनार एवी उत्तम ज्ञानरूपी ज्योतिने सिद्ध करवामां तत्पर छे
ते साधुओ आपनुं कल्याण करो. ६२.
(वसंततिलका)
वज्रे पतत्यपि भयद्रुतविश्वलोक-
मुक्ताध्वनि प्रशमिनो न चलन्ति योगात्
बोधप्रदीपहतमोहमहान्धकाराः
सम्यग्
द्रशः किमुत शेषपरीषहेषु ।।६३।।
अनुवाद : भयथी शीघ्रतापूर्वक भागनार समस्त जनसमूह द्वारा जेनो मार्ग
छोडी देवामां आवे छे एवुं वज्र पडतां पण जे मुनिओ समाधिमांथी विचलित थता
नथी. ते ज्ञानरूपी दीपक द्वारा अज्ञानरूपी घोर अंधकारनो नाश करनार सम्यग्द्रष्टि
मुनिओ शुं बाकीना परीषहो आवतां विचलित थई शके? कदी नहि. ६३.
(शार्दूलविक्रीडित)
प्रोद्यत्तिग्मकरोग्रतेजसि लसच्चण्डानिलोद्यद्दिशि
स्फारीभूतसुतप्तभूमिरजसि प्रक्षीणनद्यभ्भसि
ग्रीष्मे ये गुरुमेदिनीध्रशिरसि ज्योतिर्निधायोरसि
ध्वान्तध्वंसकरं वसन्ति मुनयस्ते सन्तु नः श्रेयसे
।।६४।।

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अनुवाद : जे ग्रीष्मकाळ उगता सूर्यना किरणोना तीक्ष्ण तेजथी संयुक्त होय
छे, जेमां तीक्ष्ण पवन (लू)थी दिशाओ परिपूर्ण थई जाय छे, जेमां अत्यंत संतप्त
थयेली पृथ्वीनी धूळ अधिक प्रमाणमां उत्पन्न थाय छे तथा जेमां नदीओनां जळ
सुकाई जाय छे ते ग्रीष्म काळमां जे मुनिओ हृदयमां अज्ञान अंधकारने नष्ट करनार
ज्ञानज्योतिने धारण करीने महापर्वतना शिखर उपर निवास करे छे ते मुनिओ
अमारुं कल्याण करो. ६४.
(शार्दूलविक्रीडित)
ते वः पान्तु मुमुक्षवः कृतरवैरब्दैरतिश्यामलैः
शश्वद्वारिवमद्भिरब्धिविषयक्षारत्वदोषादिव
काले मज्जदिले पतद्वरिकुले धावद्धुनीसंकुले
झञ्झावातविसंस्थुले तरुतले तिष्ठन्ति ये साधवः
।।६५।।
अनुवाद : जे वर्षाकाळमां गर्जना करतां, अतिशय काळा तथा समुद्रना क्षारत्व
(खाराश)ना दोषथी ज जाणे हमेशां पाणी वरसावनारा एवा वादळाओ द्वारा पृथ्वी
जळमां डूबवा लागे छे, जेमां पाणीना प्रबळ प्रवाहथी पर्वतोना समूह पडवा लागे
छे, जे वेगथी वहेती नदीओथी व्याप्त होय छे तथा जे झंझावातथी (जळमिश्रित
तीक्ष्ण वायुथी) संयुक्त होय छे. एवा ते वर्षाकाळमां जे मोक्षनी इच्छावाळा साधुओ
वृक्षनी नीचे स्थित रहे छे ते अमारी रक्षा करो. ६५.
(शार्दूलविक्रीडित)
म्लायत्कोकनदे गलत्कपिमदे भ्रश्यद् द्रुमौघच्छदे
हर्षद्रोमदरिद्रके हिमऋतावत्यन्तदुःखप्रदे
ये तिष्ठन्ति चतुष्पथे पृथुतपःसौधस्थिताः साधवः
ध्यानोष्मप्रहतोग्रंशैत्यविधुरास्ते मे विदध्युः श्रियम्
।।६६।।
अनुवाद : जे ॠतुमां कमळ करमावा लागे छे, वांदरानुं अभिमान नाश पामे
छे, वृक्षो उपरथी पांदडा नाश पामे छे तथा ठंडीथी गरीबोना रुंवाटा कंपी उठे छे; ते
अत्यंत दुःख आपनारी शियाळानी ॠतुमां विशाळ तपरूपी महेलमां स्थित अने
ध्यानरूपी उष्णताथी नष्ट करवामां आवेल तीक्ष्ण ठंडीथी रहित जे साधु चोकमां स्थित
रहे छे ते साधुओ मने लक्ष्मी आपो. ६६.

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(वसंततिलका)
कालत्रये बहिरवस्थितिजातवर्षा-
शीतातपप्रमुखसंघटितोग्रदुःखे
आत्मप्रबोधविकले सकलो ऽपि काय-
क्लेशो वृथा वृतिरिवोज्झितशालिवप्रे
।।६७।।
अनुवाद : जे साधु त्रणे ॠतुओमां घर छोडीने बहार रहेवाथी उत्पन्न
थयेल वर्षा, ठंडी अने गरमी आदिनुं तीव्र दुःख सहन करे छे ते जो ते त्रण
ॠतुओमां अध्यात्मज्ञानथी रहित होय छे तो तेमनो आ बधो य कायक्लेश एवो
ज निष्फळ छे जेवुं अनाजना छोड विनाना खेतरमां वांस अने कांटा आदिथी वाडनुं
रचवुं निष्फळ छे. ६७.
(शार्दूलविक्रीडित)
संप्रत्यस्ति न केवली किल कलौ त्रैलोक्यचूडामणिः
तद्वाचः परमासते ऽत्र भरतक्षेत्रे जगद्द्योतिकाः
सद्रत्नत्रयधारिणो यतिवरास्तासां समालम्बनं
तत्पूजा जिनवाचि पूजनमतः साक्षाज्जिनः पूजितः
।।६८।।
अनुवाद : अत्यारे आ कळिकाळ (पंचमकाळ)मां भरतक्षेत्रमां जो के त्रणे
लोकमां श्रेष्ठमां श्रेष्ठभूत केवळी भगवान विराजमान नथी छतां पण लोकने प्रकाशित
करनार तेमना वचन तो अहीं विद्यमान छे ज अने ते वचनोना आश्रयरूप
सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान अने सम्यक्चारित्ररूप उत्तम रत्नत्रयना धारक श्रेष्ठ मुनिराज
छे, तेथी उक्त मुनिओनी पूजा वास्तवमां जिनवचनोनी ज पूजा छे अने एनाथी
प्रत्यक्षमां जिन भगवाननी ज पूजा करवामां आवी छे एम समजवुं जोईए.
विशेषार्थ : आ पंचम काळमां भरत अने ऐरावत क्षेत्रोमां साक्षात् केवळी
विद्यमान होता नथी छतां पण जीवोना अज्ञान अंधकारने हरनार तेमना वचनो
(जिनागम) परंपराथी प्राप्त छे ज. ते वचनोना ज्ञाता श्रेष्ठ मुनिओ ज छे तेथी तेओ
पूजनीय छे. आ रीते करवामां आवेली उक्त मुनिओनी पूजाथी जिनागमनी पूजा अने
एनाथी साक्षात् जिन भगवाननी ज पूजा कराई छे एम समजवुं जोईए. ६८.

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(शार्दूलविक्रीडित)
स्पृष्टा यत्र मही तद्ङ्घ्रिकमलैस्तत्रैति सत्तीर्थतां
तेभ्यस्ते ऽपि सुराः कृताञ्जलिपुटा नित्यं नमस्कुर्वते
तन्नामस्मृतिमात्रतोऽपि जनता निष्कल्मषा जायते
ये जैना यतयश्चिदात्मनि परं स्नेहं समातन्वते
।।६९।।
अनुवाद : जे जैन मुनि ज्ञान दर्शन स्वरूप चैतन्यमय आत्मामां उत्कृष्ट स्नेह
करे छे तेमना चरणकमळो द्वारा ज्यां पृथ्वीनो स्पर्श थाय छे त्यांनी ते पृथ्वी उत्तम
तीर्थ बनी जाय छे, तेमने बन्ने हाथ जोडीने देवो पण नित्य नमस्कार करे छे तथा
तेमना नामना स्मरणमात्रथी ज जनसमूह पापरहित थई जाय छे. ६९.
(शार्दूलविक्रीडित)
सम्यग्दर्शनबोधवृतनिचितः शान्तः शिवैषी मुनि
र्मन्दैः स्यादवधीरितो ऽपि विशदः साम्यं यदालम्बते
आत्मा तैर्विहतो यदत्र विषमध्वान्तश्रिते निश्चितं
संपातो भवितोग्रदुःखनरके तेषामकल्याणिनाम्
।।७०।।
अनुवाद : सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान अने सम्यक्चारित्रथी संपन्न, शान्त अने
आत्मकल्याण (मोक्ष)ना अभिलाषी मुनि अज्ञानीओ द्वारा तिरस्कृत थईने य समता
(वीतरागता)नो ज आश्रय ले छे तेथी ते तो निर्मळ ज रहे छे पण तेम करवाथी
ते अज्ञानीओ ज पोताना आत्मानो घात करे छे कारण के कल्याणमार्गथी भ्रष्ट थयेला
ते अज्ञानीओनुं गाढ अंधकारथी व्याप्त अने तीव्र दुःखोथी संयुक्त एवा नरकमां
नियमथी पतन थशे. ७०.
(स्रग्धरा)
मानुष्यं प्राप्य पुण्यात्मप्रशममुपगता रोगवद्भोगजातं
मत्वा गत्वा वनान्तं
द्रशि विदि चरणे ये स्थिताः संगमुक्ताः
कः स्तोता वाक्पथातिक्रमणपटुगुणैराश्रितानां मुनीनां
स्तोतव्यास्ते महद्भिर्भुवि य इह तदङ्घ्रिद्वये भक्ति भाजः
।।७१।।
अनुवाद : जे मुनि पुण्यना प्रभावथी मनुष्य भव पामीने शान्ति पाम्या

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थका इन्द्रियजनित भोगोने रोग समान कष्टदायक समजी ले छे अने तेथी जे गृहथी
वननी मध्यमां जईने समस्त परिग्रहथी रहित थया थका सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान
अने सम्यक्चारित्रमां स्थित थई जाय छे; वचनअगोचर एवा उत्तमोत्तम गुणोना
आश्रयभूत ते मुनिओनी स्तुति करवामां क्यो स्तुतिकार समर्थ छे? कोई पण नहि.
जे मनुष्यो उक्त मुनिओना बन्ने चरणोमां अनुराग करे छे ते अहीं पृथ्वी उपर
महापुरुषो द्वारा स्तुति करवाने योग्य छे. ७१.
(शार्दूलविक्रीडित)
तत्त्वार्थाप्ततपोभृतां यतिवराः श्रद्धानमाहुद्रर्शं
ज्ञानं जानदनूनमप्रतिहतं स्वार्थावसंदेहवत्
चारित्रं विरतिः प्रमादविलसत्कर्मास्रवाद्योगिनां
एतन्मुक्ति पथस्रयं च परमो धर्मो भवच्छेदकः
।।७२।।
अनुवाद : आ रीते मुनिना आचारधर्मनुं निरूपण थयुं. सात तत्त्व, देव
अने गुरुनुं श्रद्धान करवुं; एने मुनिओमां श्रेष्ठ गणधर आदि सम्यग्दर्शन कहे छे.
स्व अने पर पदार्थ बन्नेनी न्यूनता, बाधा अने संदेह रहित थईने जे जाणे छे
तेने ज्ञान कहेवामां आवे छे. योगिओना प्रमादथी थता कर्मास्रवथी रहित थई जवानुं
नाम चारित्र छे. आ त्रणे मोक्षना मार्ग छे. आ ज त्रणेने उत्तम धर्म कहेवामां आवे
छे जे संसारनो विनाशक थाय छे. ७२.
(मालिनी)
हृदयभुवि द्रगेकं बीजमुप्तं त्वशङ्का
प्रभुतिगुणसदम्भःसारणी सिक्त मुच्चैः
भवदवगमशाखश्चारुचारित्र पुष्प
स्तरुरमृतफलेन प्रीणयत्याशु भव्यम् ।।७३।।
अनुवाद : हृदयरूपी पृथ्वीमां वावेलुं एक सम्यग्दर्शनरूपी बीज निःशंकित
आदि आठ अंगरवरूप उत्तम जळथी परिपूर्ण नानी नदी द्वारा अतिशय सींचाईने
उत्पन्न थयेली सम्यग्ज्ञानरूपी शाखाओ अने मनोहर सम्यक्चारित्ररूपी पुष्पोथी
संपन्न थतुं थकुं वृक्षरूपे परिणमे छे, जे भव्यजीवने तरत ज मोक्षरूपी फळ आपीने
प्रसन्न करे छे. ७३.

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(मालिनी)
द्रगवगमचरित्रालंकृतः सिद्धिपात्रं
लघुरपि न गुरुः स्यादन्यथात्वे कदाचित्
स्फु टमवगतमार्गो याति मन्दोऽपि गच्छ
न्नभिमतपदमन्यो नैव तूर्णो ऽपि जन्तुः ।।७४।।
अनुवाद : सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान अने सम्यक्चारित्रथी विभूषित पुरुष
जो तप आदि अन्य गुणोमां मंद पण होय तोय ते सिद्धिने पात्र छे अर्थात्
तेने सिद्धि प्राप्त थाय छे. पण एनाथी विपरीत जो रत्नत्रय रहित पुरुष अन्य
गुणोमां महान् पण होय तोय ते कदी ये सिद्धि प्राप्त करी शकतो नथी. योग्य
ज छे
स्पष्ट रीते मार्गथी परिचित मनुष्य जो चालवामां मंद पण होय तोय
ते धीरे धीरे चालीने इच्छित स्थाने पहोंची जाय छे. पण एनाथी विपरीत
जे अन्य मनुष्य मार्गथी अजाण छे ते चालवामां खूब झडपी होय तो पण
इच्छित स्थाने पहोंची शकतो नथी. ७४.
(मालिनी)
वनशिखिनि मृतो ऽन्धः संचरन् बाढमङ्ध्रि-
द्वितयविकलमूर्तिवीक्षमाणो ऽपि खञ्जः
अपि सनयनपादो ऽश्रद्दधानश्च तस्माद-
द्दगवगमचरित्रैः संयुतैरेव सिद्धिः
।।७५।।
अनुवाद : दावानळथी सळगता वनमां शीघ्र गमन करनार अंध मनुष्य मरी
जाय छे, तेवी ज रीते बन्ने पग विनानो लंगडो माणस दावानळने जोतो होवा छतां
पण चालवामां असमर्थ होवाथी बळीने मरी जाय छे. अग्निनो विश्वास न करनार
मनुष्य नेत्र अने पग संयुक्त होवा छतां पण उक्त दावानळमां भस्म थई जाय
छे. तेथी ज सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान अने सम्यक्चारित्र ए त्रणेनी एकताने प्राप्त
थतां ज तेमनाथी सिद्धि प्राप्त थाय छे, एम नक्की समजवुं जोईए.
विशेषार्थ : जेवी रीते उक्त त्रणे मनुष्योमां एक जण तो आंखोथी अग्नि देखीने अने

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भागवामां समर्थ होवा छतां पण केवळ अविश्वासने कारणे मरे छे, बीजो (आंधळो) माणस
अग्निनुं ज्ञान न होवाथी मृत्यु पामे छे, तथा त्रीजो (लंगडो) माणस अग्निनो विश्वास करीने
अने तेने जाणीने पण चालवामां असमर्थ होवाथी ज मृत्युना मुखमां प्रवेशे छे. तेवी ज रीते ज्ञान
अने चारित्ररहित जे प्राणी तत्त्वार्थनुं केवळ श्रद्धान करे छे, श्रद्धान अने चारित्रथी रहित जेने एक
मात्र तत्त्वार्थनुं परिज्ञान ज छे अथवा श्रद्धा अने ज्ञान रहित जे जीव केवळ चारित्रनुं ज परिपालन
करे छे; ए त्रणमांथी कोईने पण मोक्ष प्राप्त थई शकतो नथी. ते तो आ त्रणेनी एकतामां ज
प्राप्त थई शके छे. ७५.
(मालिनी)
बहुभिरपि किमन्यैः प्रस्तरै रत्नसंज्ञै
र्वपुषि जनितखेदैर्भारकारित्वयोगात्
ह्रतदुरिततमोभिश्चारुरत्नैरनर्ध्यै
स्त्रिभिरपि कुरुतात्मालंकृतिं दर्शनाद्यैः ।।७६।।
अनुवाद : ‘रत्न’ संज्ञा धारण करनार अन्य घणा पत्थरोथी शुं लाभ?
कारण के भारयुक्त होवाथी तेमना द्वारा केवळ शरीरमां खेद ज उत्पन्न थाय छे.
तेथी पापरूप अंधकारने नष्ट करनार सम्यग्दर्शनादिरूप अमूल्य त्रणेय सुंदर रत्नोथी
पोताना आत्माने विभूषित करवो जोईए. ७६.
(मालिनी)
जयति सुखनिधानं मोक्षवृक्षैकबीजं
सकलमलविमुक्तं दर्शनं यद्विना स्यात्
मतिरपि कुमतिर्नु दुश्चरित्रं चरित्रं
भवति मनुजजन्म प्राप्तमप्रातमेव
।।७७।।
अनुवाद : जे सम्यग्दर्शन विना ज्ञान मिथ्याज्ञान अने चारित्र मिथ्याचारित्र
रह्या करे छे ते सुखना स्थानभूत, मोक्षरूपी वृक्षना अद्वितीय बीजरूप तथा समस्त
दोषरहित सम्यग्दर्शन जयवंत वर्ते छे. उक्त सम्यग्दर्शन विना प्राप्त थयेलो मनुष्य
जन्म पण नहि प्राप्त थवा बराबर ज रहे छे. [कारण के मनुष्य जन्मनी सफळता
सम्यग्दर्शननी प्राप्तिमां ज होई शके छे, पण तेने तो प्राप्त कर्युं नथी.] ७७.

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(आर्या)
भवभुजगनागदमनी दुःखमहादावशमनजलवृष्टिः
मुक्ति सुखामृतसरसी जयति द्रगादित्रयी सम्यक् ।।७८।।
अनुवाद : जे सम्यग्दर्शन आदि त्रण रत्न संसाररूपी सर्पनुं दमन करवा
माटे नागदमनी समान छे, दुःखरूपी दावानळने शान्त करवा माटे जळवृष्टि समान
छे तथा मोक्षसुखरूप अमृतना तळाव समान छे; ते सम्यग्दर्शनादि त्रण रत्न सारी
रीते जयवंत वर्ते छे. ७८.
(मालिनी)
वचनविरचितैवोत्पद्यते भेदबुद्धि
द्रर्गवगमचरित्राण्यात्मनः स्वं स्वरूपम्
अनुपचरितमेतच्चेतनैंकस्वभावं
व्रजति विषयभावं योगिनां योग
द्रष्टेः ।।७९।।
अनुवाद : सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान अने सम्यक्चारित्र आ त्रणे आत्माना
पोताना स्वरूप छे. आमां जे भिन्नतानी बुद्धि थाय छे ते केवळ शब्दजनित ज होय
छे
वास्तवमां ते त्रणे अभिन्न ज छे. आत्मानुं आ स्वरूप उपचाररहित अर्थात्
परमार्थभूत अने चेतना ज छे एक स्वभाव जेनो एवुं थयुं थकुं योगीजनोनी योगरूप
द्रष्टिना विषयपणाने पामे छे अर्थात् तेनुं अवलोकन योगीओ ज पोतानी योगद्रष्टिथी
करी शके छे. ७९.
(उपेन्द्रवज्रा)
निरूप्य तत्त्वं स्थिरतामुपागता
मतिः सतां शुद्धनयावलम्बिनी
अखण्डमेकं विशदं चिदात्मकं
निरन्तरं पश्यति तत्परं महः
।।८०।।
अनुवाद : शुद्धनयनो आश्रय लेनारी साधुओनी बुद्धि तत्त्वनुं निरूपण करीने
स्थिरताने पामती थकी निरंतर, अखंड, एक, निर्मळ अने चेतनस्वरूप ते उत्कृष्ट
ज्योतिनुं ज अवलोकन करे छे. ८०.

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(स्रग्धरा)
द्रष्टिर्निर्णीतिरात्माह्वयविशदमहस्यत्र बोधः प्रबोधः
शुद्धं चारित्रमत्र स्थितिरिति युगपद्बन्धविध्वंसकारि
बाह्यं बाह्यार्थमेव त्रितयमपि परं स्याच्छुभो वाशुभो वा
बन्धः संसारमेवं श्रुतनिपुणधियः साधवस्तं वदन्ति
।।८१।।
अनुवाद : आत्मा नामना निर्मळ तेजनो निर्णय करवो अर्थात् पोताना शुद्ध
आत्मरूपमां रुचि उत्पन्न थवानुं नाम सम्यग्दर्शन छे. ते ज आत्मस्वरूपना ज्ञानने
सम्यग्ज्ञान कहेवामां आवे छे. ते ज आत्मस्वरूपमां लीन थवाने सम्यक्चारित्र कहे
छे. आ त्रणे एक साथे उत्पन्न थईने बंधनो विनाश करे छे. बाह्य रत्नत्रय केवळ
बाह्य पदार्थो (जीवाजीवादि)ने ज विषय करे छे अने तेनाथी शुभ अथवा अशुभ
कर्मनो बंध थाय छे जे संसार परिभ्रमणनुं ज कारण छे. आ रीते आगमना जाणकार
साधुओ निरूपण करे छे.
विशेषार्थ : सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान अने सम्यक्चारित्र आ त्रणेमांथी प्रत्येक व्यवहार
अने निश्चयना भेदथी बब्बे प्रकारना छे. एमां जीवादिक सात तत्त्वोना यथार्थ स्वरूपनुं श्रद्धान करवुं
ते व्यवहार सम्यग्दर्शन कहेवाय छे. तेमना स्वरूपने जाणवानुं नाम व्यवहार सम्यग्ज्ञान छे. अशुभ
क्रियाओनो परित्याग करीने शुभ क्रियाओमां प्रवृत्त थवाने व्यवहार सम्यक्चारित्र कहेवाय छे.
देहादिथी भिन्न आत्मामां रुचि थवानुं नाम निश्चय सम्यग्दर्शन छे. ते ज देहादिथी भिन्न आत्माना
स्वरूपना अवबोधने निश्चय सम्यग्ज्ञान कहेवामां आवे छे. आत्मस्वरूपमां लीन रहेवाने निश्चय
सम्यक्चारित्र कहे छे. एमां व्यवहार रत्नत्रय शुभ अने अशुभ कर्मोना बंधनुं कारण होवाथी स्वर्गादि
अभ्युदयनुं निमित्त थाय छे. परंतु निश्चय रत्नत्रय शुभ अने अशुभ बन्ने प्रकारना कर्मोना बंधने
नष्ट करीने मोक्षसुखनुं कारण थाय छे. ८१.
(मालिनी)
जडजनकृतबाधाक्रोशहासाप्रियादा
वपि सति न विकारं यन्मनो याति साधोः
अमलविपुलवित्ते रुत्तमा सा क्षमादौ
शिवपथपथिकानां सत्सहायत्वमेति
।।८२।।
अनुवाद : आ रीते रत्नत्रयना स्वरूपनुं निरूपण थयुं. अज्ञानी जनो द्वारा

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शारीरिक बाधा, अपशब्दोनो प्रयोग, हास्य अने बीजा पण अप्रिय कार्य करवा छतां
जे निर्मळ अने विपुल ज्ञानना धारक साधुनुं मन क्रोधादि विकारने प्राप्त थतुं नथी
तेने उत्तम क्षमा कहे छे. ते मोक्षमार्गमां चालनार पथिक जनोने सर्व प्रथम सहायक
थाय छे. ८२.
(वसंततिलका)
श्रामण्यपुण्यतरुरुच्चगुणौघशाखा
पत्रप्रसूननिचितो ऽपि फलान्यदत्त्वा
याति क्षयं क्षणत एव घनोग्रकोप
दावानलात् त्यजत तं यतयो ऽतिदूरम् ।।८३।।
अनुवाद : मुनिधर्मरूपी पवित्र वृक्ष उन्नत गुणोना समूहरूप डाळीओ, पांदडा
अने फूलोथी परिपूर्ण थयुं थकुं पण फळो न आपतां अतिशय तीव्र क्रोधरूपी
दावाग्निथी क्षणमात्रमां ज नाश पामी जाय छे. तेथी हे मुनिजनो, आप ते क्रोधने
दूरथी ज छोडी द्यो. ८३.
(शार्दूलविक्रीडित)
तिष्ठामो वयमुज्ज्वलेन मनसा रागादिदोषोज्झिताः
लोकः किंचिदपि स्वकीयहृदये स्वेच्छाचरो मन्यताम्
साध्या शुद्धिरिहात्मनः शमवतामत्रापरेण द्विषा
मित्रेणापि किमु स्वचेष्टितफलं स्वार्थः स्वयं लप्स्यते
।।८४।।
अनुवाद : अमे रागादि दोषोथी रहित थईने विशुद्ध मनथी स्थिर थईए
छीए. एने यथेच्छ आचरण करनारा लोको पोताना हृदयमां गमे तेम माने. लोकमां
शान्तिना अभिलाषी मुनिओए पोतानी आत्मशुद्धि सिद्ध करवी जोईए. तेमने अहीं
बीजा शत्रु अथवा मित्रनुं पण शुं प्रयोजन छे? ते (शत्रु के मित्र) तो पोताना करेला
कार्य अनुसार स्वयं ज फळ प्राप्त करशे. ८४.
(स्रग्धरा)
दोषानाघुष्य लोके मम भवतु सुखी दुर्जनश्चेद्धनार्थी
तत्सर्वस्वं गृहीत्वा रिपुरथ सहसा जीवितं स्थानमन्यः

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मध्यस्थस्त्वेवमेवाखिलमिह जगज्जायतां सौख्यराशिः
मत्तो माभूदसौख्यं कथमपि भविनः कस्यचित्पूत्करोमि
।।८५।।
अनुवाद : जो दुर्जन मनुष्य मारा दोषो जाहेर करीने सुखी थतो होय तो
थाव, जो धननो अभिलाषी मनुष्य मारुं सर्वस्व ग्रहण करीने सुखी थतो होय तो
थाव. जो शत्रु मारुं जीवन ग्रहण करीने सुखी थतो होय तो थाव, जो बीजा कोई
मारुं स्थान लईने सुखी थता होय तो थाव अने जे मध्यस्थ छे
रागद्वेषरहित छे
ते एवा ज मध्यस्थ बनी रहे. अहीं आखुंय जगत अतिशय सुखनो अनुभव करो.
मारा निमित्ते कोई पण संसारी प्राणीने कोई पण प्रकारे दुःख न थाव, एम हुं
ऊंचा स्वरे कहुं छुं. ८५.
(शार्दूलविक्रीडित)
कि जानासि न वीतरागमखिलत्रैलोक्यचूडामणिं
किं तद्धर्म समाश्रितं न भवता किं वा न लोको जडः
मिथ्याद्रग्भिरसज्जनैरपटुभिः किंचित्कृतोपद्रवात्
यत्कर्मार्जनहेतुमस्थिरतया बाधां मनो मन्यसे ।।८६।।
अनुवाद : हे मन! शुं तुं सम्पूर्ण त्रणे लोकमां चूडामणि समान एवा श्रेष्ठ
वीतराग जिनने नथी जाणतुं? शुं तें वीतरागकथित धर्मनो आश्रय नथी लीधो? शुं
जडसमूह जड अर्थात् अज्ञानी नथी? के जेथी तुं मिथ्याद्रष्टि अने अज्ञानी दुष्ट पुरुषो
द्वारा करवामां आवेला थोडाक उपद्रवोथी पण विचलित थईने बाधा समजे छे के
जे कर्मास्रवनुं कारण छे. ८६.
(वसंततिलका)
धर्माङ्गमेतदिह मार्दवनामधेयं
जात्यादिगर्वपरिहारमुशन्ति सन्तः
तद्धार्यते किमु न बोधद्रशा समस्तं
स्वप्नेन्द्रजालसद्रशं जगदीक्षमाणैः ।।८७।।
अनुवाद : जाति अने कुळ आदिनो गर्व न करवो, एने सज्जन पुरुषो मार्दव

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नामनो धर्म बतावे छे. ए धर्मनुं अंग छे. ज्ञानमय चक्षुथी समस्त जगतने स्वप्न
अथवा इन्द्रजाळ समान देखनार साधुओ शुं ते मार्दव धर्म धारण नथी करता?
अवश्य धारण करे छे. ८७.
(शार्दूलविक्रीडित)
कास्था सद्मनि सुन्दरेऽपि परितो दन्दह्यमानाग्निभिः
कायादौ तु जरादिभिः प्रतिदिनं गच्छत्यवस्थान्तरम्
इत्यालोचयतो हृदि प्रशमिनः शश्वद्विवेकोज्ज्वले
गर्वस्यावसरः कुतो ऽत्र घटते भावेषु सर्वेष्वपि
।।८८।।
अनुवाद : सर्व तरफथी अतिशय सळगती अग्निओथी खंडेररूप बीजी
अवस्थाने प्राप्त थनार सुन्दर गृह समान प्रतिदिन वृद्धत्व आदि द्वारा बीजी
(जीर्ण ) अवस्थाने प्राप्त थनार शरीरादि बाह्य पदार्थोमां नित्यतानो विश्वास केवी
रीते करी शकाय? अर्थात् करी शकातो नथी. आ रीते सर्वदा विचारनार साधुना
विवेकयुक्त निर्मळ हृदयमां जाति, कुळ अने ज्ञान आदि सर्व पदार्थोना विषयमां
अभिमान करवानो अवसर कयांथी प्राप्त थई शके? अर्थात् प्राप्त थई शकतो
नथी. ८८.
(आर्या)
हृदि यत्तद्वाचि बहिः फलति तदेवार्जवं भवत्येतत्
धर्मो निकृतिरधर्मो द्वाविह सुरसद्मनरकपथौ ।।८९।।
अनुवाद : जे विचार हृदयमां रह्यो होय ते ज वचनमां रहे तथा ते ज
बहार परिणमे अर्थात् शरीर वडे पण ते प्रमाणे ज कार्य करवामां आवे, ते आर्जव
धर्म छे. एनाथी विपरीत बीजाने दगो देवो, ए अधर्म छे. आ बंने अहीं क्रमशः
देवगति अने नरकगतिना कारण छे. ८९.
(शार्दूलविक्रीडित)
मायित्वं कुरुते कृतं सकृदपि च्छायाविघातं गुणे
ष्वाजातेर्यमिनोऽर्जितेष्विह गुरुक्लेशैः समादिष्वलम्

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सर्वे तत्र यदासते ऽतिनिभृताः क्रोधादयस्तत्त्वत
स्तत्पापं बत येन दुर्गतिपथे जीवश्चिरं भ्राम्यति ।।९०।।
अनुवाद : अहीं लोकमां एक वार पण करवामां आवेलो कपट व्यवहार
जन्मथी मांडीने भारे कष्टोथी उपार्जित मुनिना सम (रागद्वेषनी निवृत्ति) आदि
गुणोनो अतिशय छायाविघात करे छे, अर्थात् उक्त मायाचारथी सम आदि गुणोनी
छाया पण बाकी रहेती नथी
ते मूळमांथी नष्ट थई जाय छे, कारण के ते कपटपूर्ण
व्यवहारमां वास्तवमां क्रोधादि बधा ज दुर्गुण परिपूर्ण थईने रहे छे. खेद छे के ते
कपटव्यवहार एवुं पाप छे के जेना कारणे आ जीव नरकादि दुर्गतिओना मार्गमां
चिर काळ सुधी परिभ्रमण करे छे. ९०.
(आर्या)
स्वपरहितमेव मुनिभिर्मितममृतसमं सदैव सत्यं च
वक्त व्यं वचनमथ प्रविधेयं धीधनेर्मौनम् ।।९१।।
अनुवाद : मुनिओए सदाय एवुं सत्य वचन बोलवुं जोईए जे पोताने
अने परने पण हितकारी होय, परिमित होय, तथा अमृत समान मधुर होय जो
कदाच आवुं सत्य वचन बोलवामां बाधा जणाय तो एवी हालतमां बुद्धिरूप धनने
धारण करनार ते मुनिओए मौननुं ज अवलंबन लेवुं जोईए. ९१.
(आर्या)
सति सन्ति व्रतान्येव सूनृते वचसि स्थिते
भवत्याराधिता सद्भिर्जगत्पूज्या च भारती ।।९२।।
अनुवाद : सत्य वचननी स्थिति थतां ज व्रत थाय छे तेथी सज्जन पुरुष
जगत् पूज्य ते सत्य वचननी आराधना करे छे. ९२.
(शार्दूलविक्रीडित)
आस्तामेतदमुत्र सूनृतवचाः कालेन यल्लप्स्यते
सद्भूपत्वसुरत्वसंसृतिसरित्पाराप्तिमुख्यं फलम्
यत्प्राप्नोति यशः शशाङ्कविशदं शिष्टेसु यन्मान्यतां
तत्साधुत्वमिहैव जन्मनि परं तत्केन संवर्ण्यते
।।९३।।

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अनुवाद : सत्य वचन बोलनार प्राणी समयानुसार परलोकमां उत्तम राज्य,
देव पर्याय अने संसाररूपी नदीना पारनी प्राप्ति अर्थात् मोक्षपदरूप प्रमुख फळ
पामशे ए तो दूर रहो. पण ते आ ज भवमां जे चंद्र समान निर्मळ यश, सज्जन
पुरुषोमां प्रतिष्ठा अने साधुता प्राप्त करे छे; तेनुं वर्णन कोण करी शके छे? अर्थात्
कोई नहीं. ९३.
(आर्या)
यत्परदारार्थादिषु जन्तुषु निःस्पृहमहिंसकं चेतः
दुश्छेद्यान्तर्मलहृत्तदेव शौचं परं नान्यत् ।।९४।।
अनुवाद : जे चित्त परस्त्री अने परधननी अभिलाषा न करतु थकुं षट्काय
जीवोनी हिंसाथी रहित थई जाय छे, तेने ज दुर्भेद्य अभ्यंतर कलुषताने दूर करनार उत्तम
शौचधर्म कहेवामां आवे छे. एनाथी भिन्न बीजो कोई शौच धर्म होई शकतो नथी. ९४.
(शार्दूलविक्रीडित)
गङ्गासागरपुष्करादिषु सदा तीर्थेषु सर्वेष्वपि
स्नातस्यापि न जायते तनुभृतः प्रायो विशुद्धिः परा
मिथ्यात्वादिमलीमसं यदि मनो बाह्ये ऽतिशुद्धोदकै-
र्धौतः किं बहुशो ऽपि शुद्घयति सुरापूरप्रपूर्णो घटः
।।९५।।
अनुवाद : जो प्राणीनुं मन मिथ्यात्व आदि दोषोथी मलिन थई रह्युं होय
तो गंगा, समुद्र अने पुष्कर आदि बधा तीर्थोमां सदा स्नान करवा छतां पण घणुं
करीने ते अतिशय विशुद्ध थई शकतुं नथी. ते योग्य ज छे
मद्यना प्रवाहथी परिपूर्ण
घट जो बहारथी अतिशय विशुद्ध पाणीथी अनेकवार धोवामां आवे तो पण शुं ते
शुद्ध थई शके छे? अर्थात् थई शकतो नथी.
विशेषार्थ : आनो अभिप्राय ए छे के जो मन शुद्ध होय तो स्नानादि विना य उत्तम
शौच होई शके छे. पण एनाथी विपरीत जो मन अपवित्र होय तो गंगा आदि अनेक तीर्थोमां
वारंवार स्नान करवा छतां पण शौचधर्म कदी य होई शकतो नथी. ९५.
(आर्या)
जन्तुकृपार्दितमनसः समितिषु साधोः प्रवर्तमानस्य
प्राणेन्द्रियपरिहारं संयममाहुर्महामुनयः ।।९६।।

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अनुवाद : जेमनुं मन जीवोनी अनुकंपाथी भींजायेलुं छे तथा जे इर्याभाषा
आदि पांच समितिओमां प्रवर्तमान छे एवा साधु द्वारा जे छकाय जीवोनी रक्षा
अने पोतानी इन्द्रियोनुं दमन करवामां आवे छे तेने गणधरदेव आदि महामुनिओ
संयम कहे छे. ९६.
(शार्दूलविक्रीडित)
मानुष्यं किल दुर्लभं भवभृतस्तत्रापि जात्यादय-
स्तेष्वेवाप्तवचःश्रुतिः स्थितिरतस्तस्याश्च
द्रग्बोधने
प्राप्ते ते अतिनिर्मले अपि परं स्यातां न येनोज्झिते
स्वर्मोक्षैकफलप्रदे स च कथं न श्लाघ्यते संयमः
।।९७।।
अनुवाद : आ संसारी प्राणीने मनुष्य भव प्राप्त थवो अत्यंत कठण छे, जो
मनुष्यभव प्राप्त पण थई जाय तो तेमां य उत्तम जाति आदि मळवां कठण छे, उत्तम
जाति आदि प्राप्त थाय तो जिनवाणीनुं श्रवण दुर्लभ छे, जिनवाणीनुं श्रवण मळवा
छतां पण लांबु आयुष्य मळवुं दुर्लभ छे अने एनाथी पण दुर्लभ सम्यग्दर्शन अने
सम्यग्ज्ञान छे. जो अत्यंत निर्मळ ते बन्ने पण प्राप्त थई जाय तो जे संयम विना
ते स्वर्ग अने मोक्षरूप अद्वितीय फळ आपी शकता नथी एवो ते संयम केम प्रशंसनीय
न होय? अर्थात् ते अवश्यमेव प्रशंसाने योग्य छे. ९७.
(आर्या)
कर्ममलविलयहेतोर्बोधद्रशा तप्यते तपः प्रोक्त म्
तद् द्वेधा द्वादशधा जन्माम्बुधियानपात्रमिदम् ।।९८।।
अनुवाद : सम्यग्ज्ञानरूपी नेत्रने धारण करनार साधु द्वारा जे कर्मरूपी मेल
दूर करवा माटे तपवामां आवे छे तेने तप कहेल छे. ते बाह्य अने अभ्यंतरना
भेदथी बे प्रकारनुं तथा अनशनादि भेदथी बार प्रकारनुं छे. आ तप जन्मरूपी समुद्र
पार करवाने माटे जहाज समान छे.
विशेषार्थ : जे कर्मोनो क्षय करवाना उद्देशथी तपवामां आवे छे तेने तप कहे छे. ते
बाह्य अने अभ्यंतरना भेदथी बे प्रकारनुं छे. जे तप बाह्य द्रव्यनी अपेक्षा राखे छे तथा बीजा
द्वारा प्रत्यक्षरूपे देखी शकाय छे ते बाह्य तप कहेवाय छे. तेना नीचे प्रमाणे छ भेद छे.

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१. अनशनसंयम आदिनी सिद्धि माटे चार प्रकारना (अन्न, पेय, खाद्य अने लेह्य)
आहारनो परित्याग करवो. २. अवमौदर्यबत्रीस कोळिया प्रमाण स्वाभाविक आहारमांथी
एक-बे-त्रण आदि कोळिया ओछा करीने एक कोळिया सुधी ग्रहण करवो, ३. वृत्तिपरिसंख्यान
गृहप्रमाण तथा दाता अने भोजन आदिनो नियम करवो. गृहप्रमाणजेम के आजे हुं बे
घेर ज जईश. जो एमां आहार प्राप्त थशे तो लईश, नहि तो (बे करतां वधारे घेर
जईने) नहि. ए ज रीते दाता आदिना विषयमां पण समजवुं जोईए. ४. रसपरित्याग
दूध, दहीं, घी, तेल, गोळ अने मीठुं आ छ रसोमांथी एक बे वगेरे रसोनो त्याग करवो
अथवा तीखा, कडवा, कषायला, खाटा अने मधुर रसोमांथी एक बे वगेरे रसोनो परित्याग
करवो. ५. विविक्त शय्यासन
जंतुओनी पीडाथी रहित निर्जन शून्य गृह आदिमां शय्या के
आसन मांडवुं (सूवुं के बेसवुं). ६. कायक्लेश-तडकामां, वृक्षना मूळमां अथवा खुल्ला मेदानमां
स्थित रहीने ध्यान करवुं.
जे तप मनने नियममां राखे छे तेने अभ्यंतर तप कहे छे. तेना पण नीचे प्रमाणे छ
भेद छे.
१. प्रायश्चित्तप्रमादथी उत्पन्न थयेला दोषो दूर करवा. २. विनयपूज्य पुरुषोमां
आदरभाव राखवो. ३. वैयावृत्यशरीरनी चेष्टाथी अथवा अन्य द्रव्यथी रोगी अने वृद्ध आदि
साधुओनी सेवा करवी. ४. स्वाध्यायआळस छोडीने ज्ञाननो अभ्यास करवो. ते वाचना, पृच्छना,
अनुप्रेक्षा, आम्नाय अने धर्मोपदेशना भेदथी पांच प्रकारे छे.१. निर्दोष ग्रन्थ, अर्थ अने बन्नेयनुं
प्रदान करवुं तेने वाचना कहेवामां आवे छे. २. संशय दूर करवा माटे विशिष्ट विद्वानोने पूछवुं
तेने पृच्छना कहे छे. ३. जाणेला पदार्थनो मनथी विचार करवो तेनुं नाम अनुप्रेक्षा छे. ४. शुद्ध
उच्चारण साथे पाठनुं परिशीलन करवुं तेनुं नाम आम्नाय छे. ५. धर्मकथा वगेरे अनुष्ठानने
धर्मोपदेश कहेवामां आवे छे. ५. व्युत्सर्ग
अहंकार अने ममकारनो त्याग करवो. ६. ध्यानचित्तने
आम तेमथी खसेडीने कोई एक पदार्थना चिन्तनमां लगाववुं. ९८.
(पृथ्वी)
कषायविषयोद्भटप्रचुरतस्करौघो हठात्
तपःसुभटताडितो विघटते यतो दुर्जयः
अतो हि निरुपद्रवश्चरति तेन धर्मश्रिया
यतिः समुपलक्षितः पथि विमुक्ति पुर्याः सुखम्
।।९९।।
अनुवाद : जे क्रोधादि कषायो अने पंचेन्द्रिय विषयोरूप उद्भट अने अनेक
चोरोनो समुदाय घणी मुश्केलीथी जीती शकाय छे ते तपरूपी सुभट द्वारा बळपूर्वक

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मार खाईने नाश पामे छे. तेथी ज तप अने धर्मरूप लक्ष्मीथी संयुक्त साधु मोक्ष
नगरीना मार्गे सर्व प्रकारना विघ्न-बाधाओथी रहित थईने सुखेथी गमन करे छे.
विशेषार्थ : जेम चोरोनो समुदाय मार्गमां चालता पथिक जनोना धननुं अपहरण
करीने तेमने आगळ जवामां बाधा पहोंचाडे छे तेवी ज रीते क्रोधादि कषायो अने पंचेन्द्रिय
विषय-भोग मोक्षमार्गे चालनार सत्पुरुषोना सम्यग्दर्शनादिरूप धननुं अपहरण करीने तेमने
आगळ जवामां बाधक थाय छे. उपर्युक्त चोरोनो समुदाय जेम कोई शक्तिशाळी सुभटथी पीडित
थईने ज्यां त्यां नासी जाय छे तेवी ज रीते तप द्वारा ते विषय कषायो पण नष्ट कराय छे.
तेथी चोर न रहेवाथी जेम पथिक जन निरुपद्रव थईने मार्गमां गमन करे छे तेवी ज रीते
विषय कषायोनो नाश थवाथी सम्यग्दर्शनादि गुणोथी संपन्न साधुओ पण निर्बाधपणे मोक्षमार्गे
गमन करे छे. ९९.
(मन्दाक्रान्ता)
मिथ्यात्वादेर्यदिह भविता दुःखमुग्रं तपोभ्यो
जातं तस्मादुदककणिकैकेव सर्वाब्धिनीरात्
स्तोकं तेन प्रभवमखिलं कृच्छ्लब्धे नरत्वे
यद्येतर्हि स्खलति तदहो का क्षतिर्जीव ते स्यात्
।।१००।।
अनुवाद : लोकमां मिथ्यात्व आदिना निमित्ते जे तीव्र दुःख प्राप्त थवानुं
छे तेनी अपेक्षाए तपथी उत्पन्न थतुं दुःख एटलुं अल्प होय छे जेटलुं समुद्रना
संपूर्ण जळनी अपेक्षाए तेनुं एक टीपुं होय छे. ते तपथी बधुं ज ( समता आदि)
प्रगटे छे. तेथी हे जीव! कठिनाईथी प्राप्त थती मनुष्य पर्याय प्राप्त थता छतां पण
जो तुं आ वखते तपथी भ्रष्ट थशे तो तने केटली हानि थशे ए जाणे छे? अर्थात्
ते अवस्थामां तारुं सर्वस्व नष्ट थई जशे. १००.
(शार्दूलविक्रीडित)
व्याख्या यत् क्रियते श्रुतस्य यतये यद्दीयते पुस्तकं
स्थानं संयमसाधनादिकमपि प्रीत्या सदाचारिणा
स त्यागो वपुरादिनिर्ममतया नो किंचनास्ते यते-
राकिंचन्यमिदं च संसृतिहरो धर्मः सतां संमतः
।।१०१।।
अनुवाद : सदाचारी पुरुष द्वारा मुनिने जे प्रेमपूर्वक आगमनुं व्याख्यान

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करवामां आवे छे, पुस्तक आपवामां आवे छे तथा संयमना साधनभूत पींछी आदि
पण आपवामां आवे छे तेने उत्तम त्याग धर्म कहेवामां आवे छे. शरीर आदिमां
ममत्वबुद्धि न रहेवाथी मुनिनी पासे जे किंचित मात्र पण परिग्रह रहेतो नथी तेनुं
नाम उत्तम आकिंचन्य धर्म छे. सज्जन पुरुषोने इच्छित ते धर्म संसारनो नाश
करनार छे. १०१.
(शिखरिणि)
विमोहा मोक्षाय स्वहितनिरताश्चारुचरिताः
गृहादि त्यक्त्वा ये विदधति तपस्तेऽपि विरलाः
तपस्यन्तो ऽन्यस्मिन्नपि यमिनि शास्त्रादि ददतः
सहायाः स्युर्ये ते जगति यतयो दुर्लभतराः
।।१०२।।
अनुवाद : मोह रहित, पोताना आत्महितमां लवलीन अने उत्तम चारित्रथी
संयुक्त जे मुनिओ मोक्षप्राप्ति माटे घर आदि छोडीने तप करे छे ते पण विरल
छे अर्थात् बहु थोडा छे. वळी जे मुनि स्वयं तपश्चरण करतां थकां अन्य मुनिने
पण शास्त्रादि आपीने तेमने मदद करे छे ते तो आ संसारमां पूर्वोक्त मुनिओनी
अपेक्षाए विशेषपणे दुर्लभ छे. १०२.
(शिखरिणी)
परं मत्वा सर्वं परिह्रतमशेषं श्रुतविदा
वपुःपुस्ताद्यास्ते तदपि निकटं चेदिति मतिः
ममत्वाभावे तत्सदपि न सदन्यत्र घटते
जिनेन्द्राज्ञाभङ्गो भवति च हठात्कल्मषमृषेः
।।१०३।।
अनुवाद : आगमना जाणकार मुनिए समस्त बाह्य वस्तुओने पर अर्थात्
आत्माथी भिन्न जाणीने ते बधानो त्याग करी दीधो छे. छतां पण ज्यारे शरीर
अने पुस्तकादि तेमनी पासे रहे छे तो एवी अवस्थामां ते निष्परिग्रही केवी रीते
कही शकाय. जो एवी अहीं आशंका करवामां आवे तो तेनो उत्तर ए छे के तेमने
जोके उक्त शरीर अने पुस्तकादि प्रत्ये कोई ममत्वभाव रहेतो नथी तेथी ज तेओ
विद्यमान होवा छतां अविद्यमान समान ज छे. हा, जो उक्त मुनिने तेमना प्रत्ये

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ममत्वभाव होय तो पछी ते निष्परिग्रही कही शकाता नथी. अने एवी अवस्थामां
तेने समस्त परिग्रहना त्यागरूप जिनेन्द्र आज्ञानो भंग करवानो दोष प्राप्त थाय
छे के जेथी तेने बळपूर्वक पापबंध थाय छे. १०३.
(स्रग्धरा)
यत्संगाधारमेतश्चलति लघु च यत्तीक्ष्णदुःखौघधारं
मृत्पिण्डीभूतभूतं कृतबहुविकृतिभ्रान्ति संसारचक्रम्
ता नित्यं यन्मुमुक्षुर्यतिरमलमतिः शान्तमोहः प्रपश्ये-
ज्जामीः पुत्रीःसवित्रीरिव हरिण
द्रशस्तत्परं ब्रह्मचर्यम् ।।१०४।।
अनुवाद : जे तीव्र दुःखोना समूहरूप धारा सहित छे, जेना प्रभावथी प्राणी
माटीना पिंडानी जेम घूमे छे अने जे अनेक विकार रूप भ्रम करनार छे एवुं आ
संसाररूपी चक्र जे स्त्रीओना आधारे शीघ्रताथी फरे छे ते मृग समान नेत्रवाळी
स्त्रीओने, मोहने उपशान्त करनार, मोक्षना अभिलाषी, निर्मळ बुद्धिवाळा मुनि सदा
बहेन, दीकरी अने माता समान जुओ. ए ज उत्तम ब्रह्मचर्यनुं स्वरूप छे.
विशेषार्थःअहीं संसारमां चक्रनो आरोप मूकवामां आव्यो छे. ते आ कारणेजेम
चक्र (कुंभारनो चाकडो) खीलीना आधारे चाले छे तेवी ज रीते आ संसारचक्र (संसार परिभ्रमण)
स्त्रीओना आधारे चाले छे. चक्रमां जो तीक्ष्ण धार होय तो आ संसार चक्रमां जे अनेक दुःखोनो
समूह रहे छे ते ज तेनी तीक्ष्ण धार छे. कुंभारना चाकडा उपर जेम माटीनो पिंडो परिभ्रमण
करे छे तेम आ संसारचक्र उपर समस्त देहधारी प्राणीओ परिभ्रमण करे छे. जेम कुंभारनो चाकडो
घूमता घूमता माटीना पिंडामांथी अनेक विकारो
शकोरू, घडो, कुंडु वगेरेने उत्पन्न करे छे तेवी ज
रीते आ संसारचक्र पण अनेक विकारोजीवनी नरनारकादिरूप पर्यायोने उत्पन्न करीने तेमने घुमावे
छे. तात्पर्य ए छे के संसारपरिभ्रमणना कारणभूत स्त्रीओ छे तेमना विषयनो अनुराग छे. ते
स्त्रीओने अवस्थाविशेष प्रमाणे माता, बहेन अने दीकरी समान समजीने तेमना प्रत्ये अनुराग न
करवो ए ब्रह्मचर्य छे जे ते संसारचक्रथी जीवोनी रक्षा करे छे. १०४.
(मालिनी)
अविरतमिह तावत्पुण्यभाजो मनुष्याः
ह्रदि विरचितरागाः कामिनीनां वसन्ति
कथमपि न पुनस्ता जातु येषां तदङ्घ्री
प्रतिदिनमतिनम्रास्ते ऽपि नित्यं स्तुवन्ति
।।१०५।।

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अनुवाद : लोकमां पुण्यवान पुरुषो राग उत्पन्न करीने निरंतर स्त्रीओना
हृदयमां निवास करे छे. ए पुण्यवान पुरुषो पण, जे मुनिओना हृदयमां ते स्त्रीओ
कदी अने कोई प्रकारे पण रहेती नथी ते मुनिओना चरणनी प्रतिदिन अत्यंत नम्र
बनीने नित्य स्तुति करे छे. १०५.
(स्रग्धरा)
वैराग्यत्यागदारुद्वयकृतरचना चारुनिश्रेणिका यैः
पादस्थानैरुदारैर्दशभिरनुगता निश्चलैर्ज्ञान
द्रष्टेः
योग्या स्यादारुरुक्षोः शिवपदसदनं गन्तुमित्येषु केषां
नो धर्मेषु त्रिलोकीपतिभिरपि सदा स्तूयमानेषु हृष्टिः
।।१०६।।
अनुवाद : वैराग्य अने त्यागरूप बे लाकडाथी बनावेली सुन्दर निसरणी
जे दस महान स्थिर पगथियावाळी होईने मोक्ष-महेलमां जवा माटे चडवानी
अभिलाषा राखनार मुनिओने माटे योग्य छे. त्रणलोकना अधिपतिओ (इन्द्र,
धरनेन्द्र अने चक्रवर्ती ) द्वारा स्तूयमान ते दस धर्मोना विषयमां क्या पुरुषोने हर्ष
न थाय? १०६.
(शार्दूलविक्रीडित)
निःशेषामलशीलसद्गुणमयीमत्यन्तसाम्यस्थितां
वन्दे तां परमात्मनः प्रणयिनीं कृत्यान्तगां स्वस्थताम्
यत्रानन्तचतुष्टयामृतसरित्यात्मानमन्तर्गतं
न प्राप्नोति जरादिदुःखहशिखः संसारदावानलः
।।१०७।।
अनुवाद : जे स्वस्थता निर्मळ समस्त शील अने समीचीन गुणोथी
रचायेली छे, अत्यंत समताभाव उपर स्थित छे तथा कार्यना अंतने प्राप्त करीने
कृतकृत्य थई चुकी छे; ते परमात्मानी प्रियास्वरूप स्वस्थताने हुं नमस्कार करुं छुं.
अनंत चतुष्टयरूप अमृतनी नदी समान ते स्वस्थतामां स्थित आत्माने वृद्धत्व
आदिरूप दुःसह ज्वाळाओथी संयुक्त एवा संसाररूपी दावानल (जंगलनी आग)
प्राप्त थतो नथी. १०७.