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ये सद्बोधमयं भवन्तु भवतां ते साधवः श्रेयसे
नष्ट कराय तेवुं) मोहजनित विकल्प समूहरूपी अभ्यंतर अंधकारने नष्ट करवा माटे
सूर्यना तेजने पण जीतनार एवी उत्तम ज्ञानरूपी ज्योतिने सिद्ध करवामां तत्पर छे
ते साधुओ आपनुं कल्याण करो. ६२.
मुक्ताध्वनि प्रशमिनो न चलन्ति योगात्
सम्यग्
नथी. ते ज्ञानरूपी दीपक द्वारा अज्ञानरूपी घोर अंधकारनो नाश करनार सम्यग्द्रष्टि
मुनिओ शुं बाकीना परीषहो आवतां विचलित थई शके? कदी नहि. ६३.
स्फारीभूतसुतप्तभूमिरजसि प्रक्षीणनद्यभ्भसि
ध्वान्तध्वंसकरं वसन्ति मुनयस्ते सन्तु नः श्रेयसे
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थयेली पृथ्वीनी धूळ अधिक प्रमाणमां उत्पन्न थाय छे तथा जेमां नदीओनां जळ
सुकाई जाय छे ते ग्रीष्म काळमां जे मुनिओ हृदयमां अज्ञान अंधकारने नष्ट करनार
ज्ञानज्योतिने धारण करीने महापर्वतना शिखर उपर निवास करे छे ते मुनिओ
अमारुं कल्याण करो. ६४.
शश्वद्वारिवमद्भिरब्धिविषयक्षारत्वदोषादिव
झञ्झावातविसंस्थुले तरुतले तिष्ठन्ति ये साधवः
जळमां डूबवा लागे छे, जेमां पाणीना प्रबळ प्रवाहथी पर्वतोना समूह पडवा लागे
छे, जे वेगथी वहेती नदीओथी व्याप्त होय छे तथा जे झंझावातथी (जळमिश्रित
तीक्ष्ण वायुथी) संयुक्त होय छे. एवा ते वर्षाकाळमां जे मोक्षनी इच्छावाळा साधुओ
वृक्षनी नीचे स्थित रहे छे ते अमारी रक्षा करो. ६५.
हर्षद्रोमदरिद्रके हिमऋतावत्यन्तदुःखप्रदे
ध्यानोष्मप्रहतोग्रंशैत्यविधुरास्ते मे विदध्युः श्रियम्
अत्यंत दुःख आपनारी शियाळानी ॠतुमां विशाळ तपरूपी महेलमां स्थित अने
ध्यानरूपी उष्णताथी नष्ट करवामां आवेल तीक्ष्ण ठंडीथी रहित जे साधु चोकमां स्थित
रहे छे ते साधुओ मने लक्ष्मी आपो. ६६.
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शीतातपप्रमुखसंघटितोग्रदुःखे
क्लेशो वृथा वृतिरिवोज्झितशालिवप्रे
ॠतुओमां अध्यात्मज्ञानथी रहित होय छे तो तेमनो आ बधो य कायक्लेश एवो
ज निष्फळ छे जेवुं अनाजना छोड विनाना खेतरमां वांस अने कांटा आदिथी वाडनुं
रचवुं निष्फळ छे. ६७.
तद्वाचः परमासते ऽत्र भरतक्षेत्रे जगद्द्योतिकाः
तत्पूजा जिनवाचि पूजनमतः साक्षाज्जिनः पूजितः
करनार तेमना वचन तो अहीं विद्यमान छे ज अने ते वचनोना आश्रयरूप
सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान अने सम्यक्चारित्ररूप उत्तम रत्नत्रयना धारक श्रेष्ठ मुनिराज
छे, तेथी उक्त मुनिओनी पूजा वास्तवमां जिनवचनोनी ज पूजा छे अने एनाथी
प्रत्यक्षमां जिन भगवाननी ज पूजा करवामां आवी छे एम समजवुं जोईए.
(जिनागम) परंपराथी प्राप्त छे ज. ते वचनोना ज्ञाता श्रेष्ठ मुनिओ ज छे तेथी तेओ
पूजनीय छे. आ रीते करवामां आवेली उक्त मुनिओनी पूजाथी जिनागमनी पूजा अने
एनाथी साक्षात् जिन भगवाननी ज पूजा कराई छे एम समजवुं जोईए. ६८.
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तेभ्यस्ते ऽपि सुराः कृताञ्जलिपुटा नित्यं नमस्कुर्वते
ये जैना यतयश्चिदात्मनि परं स्नेहं समातन्वते
तीर्थ बनी जाय छे, तेमने बन्ने हाथ जोडीने देवो पण नित्य नमस्कार करे छे तथा
तेमना नामना स्मरणमात्रथी ज जनसमूह पापरहित थई जाय छे. ६९.
संपातो भवितोग्रदुःखनरके तेषामकल्याणिनाम्
(वीतरागता)नो ज आश्रय ले छे तेथी ते तो निर्मळ ज रहे छे पण तेम करवाथी
ते अज्ञानीओ ज पोताना आत्मानो घात करे छे कारण के कल्याणमार्गथी भ्रष्ट थयेला
ते अज्ञानीओनुं गाढ अंधकारथी व्याप्त अने तीव्र दुःखोथी संयुक्त एवा नरकमां
नियमथी पतन थशे. ७०.
मत्वा गत्वा वनान्तं
स्तोतव्यास्ते महद्भिर्भुवि य इह तदङ्घ्रिद्वये भक्ति भाजः
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वननी मध्यमां जईने समस्त परिग्रहथी रहित थया थका सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान
अने सम्यक्चारित्रमां स्थित थई जाय छे; वचनअगोचर एवा उत्तमोत्तम गुणोना
आश्रयभूत ते मुनिओनी स्तुति करवामां क्यो स्तुतिकार समर्थ छे? कोई पण नहि.
जे मनुष्यो उक्त मुनिओना बन्ने चरणोमां अनुराग करे छे ते अहीं पृथ्वी उपर
महापुरुषो द्वारा स्तुति करवाने योग्य छे. ७१.
एतन्मुक्ति पथस्रयं च परमो धर्मो भवच्छेदकः
स्व अने पर पदार्थ बन्नेनी न्यूनता, बाधा अने संदेह रहित थईने जे जाणे छे
तेने ज्ञान कहेवामां आवे छे. योगिओना प्रमादथी थता कर्मास्रवथी रहित थई जवानुं
नाम चारित्र छे. आ त्रणे मोक्षना मार्ग छे. आ ज त्रणेने उत्तम धर्म कहेवामां आवे
छे जे संसारनो विनाशक थाय छे. ७२.
उत्पन्न थयेली सम्यग्ज्ञानरूपी शाखाओ अने मनोहर सम्यक्चारित्ररूपी पुष्पोथी
संपन्न थतुं थकुं वृक्षरूपे परिणमे छे, जे भव्यजीवने तरत ज मोक्षरूपी फळ आपीने
प्रसन्न करे छे. ७३.
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तेने सिद्धि प्राप्त थाय छे. पण एनाथी विपरीत जो रत्नत्रय रहित पुरुष अन्य
गुणोमां महान् पण होय तोय ते कदी ये सिद्धि प्राप्त करी शकतो नथी. योग्य
ज छे
जे अन्य मनुष्य मार्गथी अजाण छे ते चालवामां खूब झडपी होय तो पण
इच्छित स्थाने पहोंची शकतो नथी. ७४.
द्वितयविकलमूर्तिवीक्षमाणो ऽपि खञ्जः
द्दगवगमचरित्रैः संयुतैरेव सिद्धिः
पण चालवामां असमर्थ होवाथी बळीने मरी जाय छे. अग्निनो विश्वास न करनार
मनुष्य नेत्र अने पग संयुक्त होवा छतां पण उक्त दावानळमां भस्म थई जाय
छे. तेथी ज सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान अने सम्यक्चारित्र ए त्रणेनी एकताने प्राप्त
थतां ज तेमनाथी सिद्धि प्राप्त थाय छे, एम नक्की समजवुं जोईए.
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अग्निनुं ज्ञान न होवाथी मृत्यु पामे छे, तथा त्रीजो (लंगडो) माणस अग्निनो विश्वास करीने
अने तेने जाणीने पण चालवामां असमर्थ होवाथी ज मृत्युना मुखमां प्रवेशे छे. तेवी ज रीते ज्ञान
अने चारित्ररहित जे प्राणी तत्त्वार्थनुं केवळ श्रद्धान करे छे, श्रद्धान अने चारित्रथी रहित जेने एक
मात्र तत्त्वार्थनुं परिज्ञान ज छे अथवा श्रद्धा अने ज्ञान रहित जे जीव केवळ चारित्रनुं ज परिपालन
करे छे; ए त्रणमांथी कोईने पण मोक्ष प्राप्त थई शकतो नथी. ते तो आ त्रणेनी एकतामां ज
प्राप्त थई शके छे. ७५.
तेथी पापरूप अंधकारने नष्ट करनार सम्यग्दर्शनादिरूप अमूल्य त्रणेय सुंदर रत्नोथी
पोताना आत्माने विभूषित करवो जोईए. ७६.
सकलमलविमुक्तं दर्शनं यद्विना स्यात्
भवति मनुजजन्म प्राप्तमप्रातमेव
दोषरहित सम्यग्दर्शन जयवंत वर्ते छे. उक्त सम्यग्दर्शन विना प्राप्त थयेलो मनुष्य
जन्म पण नहि प्राप्त थवा बराबर ज रहे छे. [कारण के मनुष्य जन्मनी सफळता
सम्यग्दर्शननी प्राप्तिमां ज होई शके छे, पण तेने तो प्राप्त कर्युं नथी.] ७७.
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छे तथा मोक्षसुखरूप अमृतना तळाव समान छे; ते सम्यग्दर्शनादि त्रण रत्न सारी
रीते जयवंत वर्ते छे. ७८.
व्रजति विषयभावं योगिनां योग
छे
द्रष्टिना विषयपणाने पामे छे अर्थात् तेनुं अवलोकन योगीओ ज पोतानी योगद्रष्टिथी
करी शके छे. ७९.
मतिः सतां शुद्धनयावलम्बिनी
निरन्तरं पश्यति तत्परं महः
ज्योतिनुं ज अवलोकन करे छे. ८०.
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बन्धः संसारमेवं श्रुतनिपुणधियः साधवस्तं वदन्ति
सम्यग्ज्ञान कहेवामां आवे छे. ते ज आत्मस्वरूपमां लीन थवाने सम्यक्चारित्र कहे
छे. आ त्रणे एक साथे उत्पन्न थईने बंधनो विनाश करे छे. बाह्य रत्नत्रय केवळ
बाह्य पदार्थो (जीवाजीवादि)ने ज विषय करे छे अने तेनाथी शुभ अथवा अशुभ
कर्मनो बंध थाय छे जे संसार परिभ्रमणनुं ज कारण छे. आ रीते आगमना जाणकार
साधुओ निरूपण करे छे.
ते व्यवहार सम्यग्दर्शन कहेवाय छे. तेमना स्वरूपने जाणवानुं नाम व्यवहार सम्यग्ज्ञान छे. अशुभ
क्रियाओनो परित्याग करीने शुभ क्रियाओमां प्रवृत्त थवाने व्यवहार सम्यक्चारित्र कहेवाय छे.
देहादिथी भिन्न आत्मामां रुचि थवानुं नाम निश्चय सम्यग्दर्शन छे. ते ज देहादिथी भिन्न आत्माना
स्वरूपना अवबोधने निश्चय सम्यग्ज्ञान कहेवामां आवे छे. आत्मस्वरूपमां लीन रहेवाने निश्चय
सम्यक्चारित्र कहे छे. एमां व्यवहार रत्नत्रय शुभ अने अशुभ कर्मोना बंधनुं कारण होवाथी स्वर्गादि
अभ्युदयनुं निमित्त थाय छे. परंतु निश्चय रत्नत्रय शुभ अने अशुभ बन्ने प्रकारना कर्मोना बंधने
नष्ट करीने मोक्षसुखनुं कारण थाय छे. ८१.
शिवपथपथिकानां सत्सहायत्वमेति
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जे निर्मळ अने विपुल ज्ञानना धारक साधुनुं मन क्रोधादि विकारने प्राप्त थतुं नथी
तेने उत्तम क्षमा कहे छे. ते मोक्षमार्गमां चालनार पथिक जनोने सर्व प्रथम सहायक
थाय छे. ८२.
दावाग्निथी क्षणमात्रमां ज नाश पामी जाय छे. तेथी हे मुनिजनो, आप ते क्रोधने
दूरथी ज छोडी द्यो. ८३.
लोकः किंचिदपि स्वकीयहृदये स्वेच्छाचरो मन्यताम्
मित्रेणापि किमु स्वचेष्टितफलं स्वार्थः स्वयं लप्स्यते
शान्तिना अभिलाषी मुनिओए पोतानी आत्मशुद्धि सिद्ध करवी जोईए. तेमने अहीं
बीजा शत्रु अथवा मित्रनुं पण शुं प्रयोजन छे? ते (शत्रु के मित्र) तो पोताना करेला
कार्य अनुसार स्वयं ज फळ प्राप्त करशे. ८४.
तत्सर्वस्वं गृहीत्वा रिपुरथ सहसा जीवितं स्थानमन्यः
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मत्तो माभूदसौख्यं कथमपि भविनः कस्यचित्पूत्करोमि
थाव. जो शत्रु मारुं जीवन ग्रहण करीने सुखी थतो होय तो थाव, जो बीजा कोई
मारुं स्थान लईने सुखी थता होय तो थाव अने जे मध्यस्थ छे
मारा निमित्ते कोई पण संसारी प्राणीने कोई पण प्रकारे दुःख न थाव, एम हुं
ऊंचा स्वरे कहुं छुं. ८५.
किं तद्धर्म समाश्रितं न भवता किं वा न लोको जडः
जडसमूह जड अर्थात् अज्ञानी नथी? के जेथी तुं मिथ्याद्रष्टि अने अज्ञानी दुष्ट पुरुषो
द्वारा करवामां आवेला थोडाक उपद्रवोथी पण विचलित थईने बाधा समजे छे के
जे कर्मास्रवनुं कारण छे. ८६.
जात्यादिगर्वपरिहारमुशन्ति सन्तः
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अथवा इन्द्रजाळ समान देखनार साधुओ शुं ते मार्दव धर्म धारण नथी करता?
अवश्य धारण करे छे. ८७.
कायादौ तु जरादिभिः प्रतिदिनं गच्छत्यवस्थान्तरम्
गर्वस्यावसरः कुतो ऽत्र घटते भावेषु सर्वेष्वपि
(जीर्ण ) अवस्थाने प्राप्त थनार शरीरादि बाह्य पदार्थोमां नित्यतानो विश्वास केवी
रीते करी शकाय? अर्थात् करी शकातो नथी. आ रीते सर्वदा विचारनार साधुना
विवेकयुक्त निर्मळ हृदयमां जाति, कुळ अने ज्ञान आदि सर्व पदार्थोना विषयमां
अभिमान करवानो अवसर कयांथी प्राप्त थई शके? अर्थात् प्राप्त थई शकतो
नथी. ८८.
धर्म छे. एनाथी विपरीत बीजाने दगो देवो, ए अधर्म छे. आ बंने अहीं क्रमशः
देवगति अने नरकगतिना कारण छे. ८९.
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छाया पण बाकी रहेती नथी
कपटव्यवहार एवुं पाप छे के जेना कारणे आ जीव नरकादि दुर्गतिओना मार्गमां
चिर काळ सुधी परिभ्रमण करे छे. ९०.
कदाच आवुं सत्य वचन बोलवामां बाधा जणाय तो एवी हालतमां बुद्धिरूप धनने
धारण करनार ते मुनिओए मौननुं ज अवलंबन लेवुं जोईए. ९१.
सद्भूपत्वसुरत्वसंसृतिसरित्पाराप्तिमुख्यं फलम्
तत्साधुत्वमिहैव जन्मनि परं तत्केन संवर्ण्यते
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पामशे ए तो दूर रहो. पण ते आ ज भवमां जे चंद्र समान निर्मळ यश, सज्जन
पुरुषोमां प्रतिष्ठा अने साधुता प्राप्त करे छे; तेनुं वर्णन कोण करी शके छे? अर्थात्
कोई नहीं. ९३.
शौचधर्म कहेवामां आवे छे. एनाथी भिन्न बीजो कोई शौच धर्म होई शकतो नथी. ९४.
स्नातस्यापि न जायते तनुभृतः प्रायो विशुद्धिः परा
र्धौतः किं बहुशो ऽपि शुद्घयति सुरापूरप्रपूर्णो घटः
करीने ते अतिशय विशुद्ध थई शकतुं नथी. ते योग्य ज छे
शुद्ध थई शके छे? अर्थात् थई शकतो नथी.
वारंवार स्नान करवा छतां पण शौचधर्म कदी य होई शकतो नथी. ९५.
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अने पोतानी इन्द्रियोनुं दमन करवामां आवे छे तेने गणधरदेव आदि महामुनिओ
संयम कहे छे. ९६.
स्तेष्वेवाप्तवचःश्रुतिः स्थितिरतस्तस्याश्च
स्वर्मोक्षैकफलप्रदे स च कथं न श्लाघ्यते संयमः
जाति आदि प्राप्त थाय तो जिनवाणीनुं श्रवण दुर्लभ छे, जिनवाणीनुं श्रवण मळवा
छतां पण लांबु आयुष्य मळवुं दुर्लभ छे अने एनाथी पण दुर्लभ सम्यग्दर्शन अने
सम्यग्ज्ञान छे. जो अत्यंत निर्मळ ते बन्ने पण प्राप्त थई जाय तो जे संयम विना
ते स्वर्ग अने मोक्षरूप अद्वितीय फळ आपी शकता नथी एवो ते संयम केम प्रशंसनीय
न होय? अर्थात् ते अवश्यमेव प्रशंसाने योग्य छे. ९७.
भेदथी बे प्रकारनुं तथा अनशनादि भेदथी बार प्रकारनुं छे. आ तप जन्मरूपी समुद्र
पार करवाने माटे जहाज समान छे.
द्वारा प्रत्यक्षरूपे देखी शकाय छे ते बाह्य तप कहेवाय छे. तेना नीचे प्रमाणे छ भेद छे.
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जईने) नहि. ए ज रीते दाता आदिना विषयमां पण समजवुं जोईए. ४. रसपरित्याग
अथवा तीखा, कडवा, कषायला, खाटा अने मधुर रसोमांथी एक बे वगेरे रसोनो परित्याग
करवो. ५. विविक्त शय्यासन
स्थित रहीने ध्यान करवुं.
तेने पृच्छना कहे छे. ३. जाणेला पदार्थनो मनथी विचार करवो तेनुं नाम अनुप्रेक्षा छे. ४. शुद्ध
उच्चारण साथे पाठनुं परिशीलन करवुं तेनुं नाम आम्नाय छे. ५. धर्मकथा वगेरे अनुष्ठानने
धर्मोपदेश कहेवामां आवे छे. ५. व्युत्सर्ग
तपःसुभटताडितो विघटते यतो दुर्जयः
यतिः समुपलक्षितः पथि विमुक्ति पुर्याः सुखम्
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नगरीना मार्गे सर्व प्रकारना विघ्न-बाधाओथी रहित थईने सुखेथी गमन करे छे.
विषय-भोग मोक्षमार्गे चालनार सत्पुरुषोना सम्यग्दर्शनादिरूप धननुं अपहरण करीने तेमने
आगळ जवामां बाधक थाय छे. उपर्युक्त चोरोनो समुदाय जेम कोई शक्तिशाळी सुभटथी पीडित
थईने ज्यां त्यां नासी जाय छे तेवी ज रीते तप द्वारा ते विषय कषायो पण नष्ट कराय छे.
तेथी चोर न रहेवाथी जेम पथिक जन निरुपद्रव थईने मार्गमां गमन करे छे तेवी ज रीते
विषय कषायोनो नाश थवाथी सम्यग्दर्शनादि गुणोथी संपन्न साधुओ पण निर्बाधपणे मोक्षमार्गे
गमन करे छे. ९९.
जातं तस्मादुदककणिकैकेव सर्वाब्धिनीरात्
यद्येतर्हि स्खलति तदहो का क्षतिर्जीव ते स्यात्
संपूर्ण जळनी अपेक्षाए तेनुं एक टीपुं होय छे. ते तपथी बधुं ज ( समता आदि)
प्रगटे छे. तेथी हे जीव! कठिनाईथी प्राप्त थती मनुष्य पर्याय प्राप्त थता छतां पण
जो तुं आ वखते तपथी भ्रष्ट थशे तो तने केटली हानि थशे ए जाणे छे? अर्थात्
ते अवस्थामां तारुं सर्वस्व नष्ट थई जशे. १००.
स्थानं संयमसाधनादिकमपि प्रीत्या सदाचारिणा
राकिंचन्यमिदं च संसृतिहरो धर्मः सतां संमतः
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पण आपवामां आवे छे तेने उत्तम त्याग धर्म कहेवामां आवे छे. शरीर आदिमां
ममत्वबुद्धि न रहेवाथी मुनिनी पासे जे किंचित मात्र पण परिग्रह रहेतो नथी तेनुं
नाम उत्तम आकिंचन्य धर्म छे. सज्जन पुरुषोने इच्छित ते धर्म संसारनो नाश
करनार छे. १०१.
गृहादि त्यक्त्वा ये विदधति तपस्तेऽपि विरलाः
सहायाः स्युर्ये ते जगति यतयो दुर्लभतराः
छे अर्थात् बहु थोडा छे. वळी जे मुनि स्वयं तपश्चरण करतां थकां अन्य मुनिने
पण शास्त्रादि आपीने तेमने मदद करे छे ते तो आ संसारमां पूर्वोक्त मुनिओनी
अपेक्षाए विशेषपणे दुर्लभ छे. १०२.
वपुःपुस्ताद्यास्ते तदपि निकटं चेदिति मतिः
जिनेन्द्राज्ञाभङ्गो भवति च हठात्कल्मषमृषेः
अने पुस्तकादि तेमनी पासे रहे छे तो एवी अवस्थामां ते निष्परिग्रही केवी रीते
कही शकाय. जो एवी अहीं आशंका करवामां आवे तो तेनो उत्तर ए छे के तेमने
जोके उक्त शरीर अने पुस्तकादि प्रत्ये कोई ममत्वभाव रहेतो नथी तेथी ज तेओ
विद्यमान होवा छतां अविद्यमान समान ज छे. हा, जो उक्त मुनिने तेमना प्रत्ये
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तेने समस्त परिग्रहना त्यागरूप जिनेन्द्र आज्ञानो भंग करवानो दोष प्राप्त थाय
छे के जेथी तेने बळपूर्वक पापबंध थाय छे. १०३.
मृत्पिण्डीभूतभूतं कृतबहुविकृतिभ्रान्ति संसारचक्रम्
ज्जामीः पुत्रीःसवित्रीरिव हरिण
संसाररूपी चक्र जे स्त्रीओना आधारे शीघ्रताथी फरे छे ते मृग समान नेत्रवाळी
स्त्रीओने, मोहने उपशान्त करनार, मोक्षना अभिलाषी, निर्मळ बुद्धिवाळा मुनि सदा
बहेन, दीकरी अने माता समान जुओ. ए ज उत्तम ब्रह्मचर्यनुं स्वरूप छे.
स्त्रीओना आधारे चाले छे. चक्रमां जो तीक्ष्ण धार होय तो आ संसार चक्रमां जे अनेक दुःखोनो
समूह रहे छे ते ज तेनी तीक्ष्ण धार छे. कुंभारना चाकडा उपर जेम माटीनो पिंडो परिभ्रमण
करे छे तेम आ संसारचक्र उपर समस्त देहधारी प्राणीओ परिभ्रमण करे छे. जेम कुंभारनो चाकडो
घूमता घूमता माटीना पिंडामांथी अनेक विकारो
स्त्रीओने अवस्थाविशेष प्रमाणे माता, बहेन अने दीकरी समान समजीने तेमना प्रत्ये अनुराग न
करवो ए ब्रह्मचर्य छे जे ते संसारचक्रथी जीवोनी रक्षा करे छे. १०४.
ह्रदि विरचितरागाः कामिनीनां वसन्ति
प्रतिदिनमतिनम्रास्ते ऽपि नित्यं स्तुवन्ति
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कदी अने कोई प्रकारे पण रहेती नथी ते मुनिओना चरणनी प्रतिदिन अत्यंत नम्र
बनीने नित्य स्तुति करे छे. १०५.
पादस्थानैरुदारैर्दशभिरनुगता निश्चलैर्ज्ञान
नो धर्मेषु त्रिलोकीपतिभिरपि सदा स्तूयमानेषु हृष्टिः
अभिलाषा राखनार मुनिओने माटे योग्य छे. त्रणलोकना अधिपतिओ (इन्द्र,
धरनेन्द्र अने चक्रवर्ती ) द्वारा स्तूयमान ते दस धर्मोना विषयमां क्या पुरुषोने हर्ष
न थाय? १०६.
वन्दे तां परमात्मनः प्रणयिनीं कृत्यान्तगां स्वस्थताम्
न प्राप्नोति जरादिदुःखहशिखः संसारदावानलः
कृतकृत्य थई चुकी छे; ते परमात्मानी प्रियास्वरूप स्वस्थताने हुं नमस्कार करुं छुं.
अनंत चतुष्टयरूप अमृतनी नदी समान ते स्वस्थतामां स्थित आत्माने वृद्धत्व
आदिरूप दुःसह ज्वाळाओथी संयुक्त एवा संसाररूपी दावानल (जंगलनी आग)
प्राप्त थतो नथी. १०७.