adhikAr-2 dohA-189 ]paramAtmaprakAsha [ 517
अथ चतुर्विशंतिसूत्रप्रमितमहास्थलमध्ये परमसमाधिव्याख्यानमुख्यत्वेन सूत्रषट्कमन्तर-
स्थलं कथ्यते । तद्यथा —
३२०) परम-समाहि-महा-सरहिँ जे बुड्डहिँ पइसेवि ।
अप्पा थक्कइ विमलु तहँ भव-मल जंति वहेवि ।।१८९।।
परमसमाधिमहासरसि ये मज्जन्ति प्रविश्य ।
आत्मा तिष्ठति विमलः तेषां भवमलानि यान्ति ऊढ्वा ।।१८९।।
जे बुड्डहिं ये केचना पुरुषा मग्ना भवन्ति । क्व । परम-समाहि-महा-सरहिं
परमसमाधिमहासरोवरे । किं कृत्वा मग्ना भवन्ति । पइसेवि प्रविश्य सर्वात्मप्रदेशैरवगाह्य अप्पा
थक्कइ चिदानन्दैकस्वभावः परमात्मा तिष्ठति । कथंभूतः । विमलु द्रव्यकर्मनोकर्ममतिज्ञानादि-
विभावगुणनरकादिविभावपर्यायमलरहितः तहं तेषां परमसमाधिरतपुरुषाणां भव-मल जंति
have, chovIs sUtronA mahAsthaLomAn param samAdhinA vyAkhyAnanI mukhyatAthI chha
dohAsUtronun antarasthaL kahe chhe. te A pramANe —
bhAvArtha — je koI puruSho paramasamAdhirUp mahAsarovaramAn, sarvaAtmapradeshothI
avagAhIne, magna thAy chhe te paramasamAdhimAn rat puruShomAn dravyakarma, nokarma, matignAnAdi
vibhAvaguN ane naranArakAdi vibhAvaparyAyarUp maLathI rahit ek chidAnand svabhAvarUp paramAtmA
sthir thAy chhe, ane bhavarahit shuddhaAtmadravyathI vilakShaN bhavamaLanA kAraNabhUt je karmo te
आगे चौबीस दोहोंके स्थलमें परमसमाधिके व्याख्यानकी मुख्यतासे छह दोहा – सूत्र
कहते हैं —
गाथा – १८९
अन्वयार्थ : — [ये ] जो कोई महान पुरुष [परमसमाधिमहासरसि ] परमसमाधिरूप
सरोवरमें [प्रविश्य ] घुसकर [मज्जन्ति ] मग्न होते हैं, उनके सब प्रदेश समाधिरसमें भींग जाते
हैं, [आत्मा तिष्ठति ] उन्हींके चिदानंद अखंड स्वभाव आत्माका ध्यान स्थिर होता है । जो
कि आत्मा [विमलः ] द्रव्यकर्म, भावकर्म, नोकर्मसे रहित महा निर्मल है, [तेषां ] जो योगी
परमसमाधिमें रत हैं, उन्हीं पुरुषोंके [भवमलानि ] शुद्धात्मद्रव्यसे विपरीत अशुद्ध भावके
कारण जो कर्म हैं, वे सब [(ऊढ्वा) बहित्वा यांति ] शुद्धात्म परिणामरूप जो जलका प्रवाह
उसमें बह जाते हैं ।