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yogIndudevavirachita
[ adhikAr-2 dohA-190
भवरहितात् शुद्धात्मद्रव्याद्विलक्षणानि यानि कर्माणि भवमलकारणभूतानि गच्छन्ति । किं कृत्वा ।
वहेवि । शुद्धपरिणामनीरप्रवाहेण ऊद्वेति भावार्थः ।।१८९।।
अथ —
३२१) सयल-वियप्पहँ जो विलउ परम-समाहि भणंति ।
तेण सुहासुह-भावडा मुणि सयल वि मेल्लंति ।।१९०।।
सकलविकल्पानां यः विलयः (तं) परमसमाधिं भणन्ति ।
तेन शुभाशुभभावान् मुनयः सकलानपि मुञ्चन्ति ।।१९०।।
भणंति कथयन्ति । के ते । वीतरागसर्वज्ञाः । कं भणन्ति । परम-समाहि वीतराग-
परमसामायिकरूपं परमसमाधिं जो विलउ यं विलयं विनाशम् । केषाम् । सयल-वियप्पहं
निर्विकल्पात्परमात्मस्वरूपात्प्रतिकूलानां समस्तविकल्पानां तेण तेन कारणेन मेल्लंति मुञ्चन्ति । के
shuddhapariNAmarUpI jaLanA pravAhamAn taNAI jAy chhe-dhovAI jAy chhe, e bhAvArtha chhe. 189.
vaLI (have paramasamAdhinun lakShaN kahe chhe) —
bhAvArtha — nirvikalpa paramAtma svarUpathI pratikUL samasta vikalpono vinAsh thavo
tene vItarAgasarvagnadev, vItarAg param sAmAyikarUp param samAdhi kahe chhe, te kAraNe param-
भावार्थ : — जहाँ जलका प्रवाह आवे, वहाँ मल कैसे रह सकता है, कभी नहीं
रहता ।।१८९।।
आगे परमसमाधिका लक्षण कहते हैं —
गाथा – १९०
अन्वयार्थ : — [यः ] जो [सकलविकल्पानां ] निर्विकल्पपरमात्मस्वरूपसे विपरीत
रागादि समस्त विकल्पोंका [विलयः ] नाश होना, उसको [परमसमाधिं भणंति ] परमसमाधि
कहते हैं, [तेन ] इस परमसमाधिसे [मुनयः ] मुनिराज [सकलानपि ] सभी
[शुभाशुभविकल्पान् ] शुभ-अशुभ भावोंको [मुंचंति ] छोड़ देते हैं ।
भावार्थ : — परम आराध्य जो आत्मस्वरूप उसके ध्यानमें लीन जो तपोधन वे शुभ
-अशुभ मन, वचन, कायके व्यापारसे रहित जो शुद्धात्मद्रव्य उससे विपरीत जो अच्छे-बुरे भाव
उन सबको छोड़ देते हैं, समस्त परद्रव्यकी आशासे रहित जो निज शुद्धात्मस्वभाव उससे