Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (English transliteration). Gatha: 190 (Adhikar 2).

< Previous Page   Next Page >


Page 518 of 565
PDF/HTML Page 532 of 579

 

background image
518 ]
yogIndudevavirachita
[ adhikAr-2 dohA-190
भवरहितात् शुद्धात्मद्रव्याद्विलक्षणानि यानि कर्माणि भवमलकारणभूतानि गच्छन्ति किं कृत्वा
वहेवि शुद्धपरिणामनीरप्रवाहेण ऊद्वेति भावार्थः ।।१८९।।
अथ
३२१) सयल-वियप्पहँ जो विलउ परम-समाहि भणंति
तेण सुहासुह-भावडा मुणि सयल वि मेल्लंति ।।१९०।।
सकलविकल्पानां यः विलयः (तं) परमसमाधिं भणन्ति
तेन शुभाशुभभावान् मुनयः सकलानपि मुञ्चन्ति ।।१९०।।
भणंति कथयन्ति के ते वीतरागसर्वज्ञाः कं भणन्ति परम-समाहि वीतराग-
परमसामायिकरूपं परमसमाधिं जो विलउ यं विलयं विनाशम् केषाम् सयल-वियप्पह
निर्विकल्पात्परमात्मस्वरूपात्प्रतिकूलानां समस्तविकल्पानां तेण तेन कारणेन मेल्लंति मुञ्चन्ति के
shuddhapariNAmarUpI jaLanA pravAhamAn taNAI jAy chhe-dhovAI jAy chhe, e bhAvArtha chhe. 189.
vaLI (have paramasamAdhinun lakShaN kahe chhe)
bhAvArthanirvikalpa paramAtma svarUpathI pratikUL samasta vikalpono vinAsh thavo
tene vItarAgasarvagnadev, vItarAg param sAmAyikarUp param samAdhi kahe chhe, te kAraNe param-
भावार्थ :जहाँ जलका प्रवाह आवे, वहाँ मल कैसे रह सकता है, कभी नहीं
रहता ।।१८९।।
आगे परमसमाधिका लक्षण कहते हैं
गाथा१९०
अन्वयार्थ :[यः ] जो [सकलविकल्पानां ] निर्विकल्पपरमात्मस्वरूपसे विपरीत
रागादि समस्त विकल्पोंका [विलयः ] नाश होना, उसको [परमसमाधिं भणंति ] परमसमाधि
कहते हैं, [तेन ] इस परमसमाधिसे [मुनयः ] मुनिराज [सकलानपि ] सभी
[शुभाशुभविकल्पान् ] शुभ-अशुभ भावोंको [मुंचंति ] छोड़ देते हैं
भावार्थ :परम आराध्य जो आत्मस्वरूप उसके ध्यानमें लीन जो तपोधन वे शुभ
-अशुभ मन, वचन, कायके व्यापारसे रहित जो शुद्धात्मद्रव्य उससे विपरीत जो अच्छे-बुरे भाव
उन सबको छोड़ देते हैं, समस्त परद्रव्यकी आशासे रहित जो निज शुद्धात्मस्वभाव उससे