Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (Malayalam transliteration). Gatha-37 (Adhikar 2).

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Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ശ്രീ ദിഗംബര ജൈന സ്വാധ്യായമംദിര ട്രസ്ട, സോനഗഢ - ൩൬൪൨൫൦
൨൭൮ ]യോഗീന്ദുദേവവിരചിത: [ അധികാര-൨ : ദോഹാ-൩൭
अथ सुखदुःखं सहमानः सन् येन कारणेन समभावं करोति मुनिस्तेन कारणेन
पुण्यपापद्वयसंवरहेतुर्भवतीति दर्शयति
१६३) बिण्णि वि जेण सहंतु मुणि मणि सम-भाउ करेइ
पुण्णहँ पावहँ तेण जिय संवर-हेउ हवेइ ।।३७।।
द्वे अपि येन सहमानः मुनिः मनसि समभावं करोति
पुण्यस्य पापस्य तेन जीव संवरहेतुः भवति ।।३७।।
बिण्णि वि इत्यादि बिण्णि वि द्वे अपि सुखदुःखे जेण येन कारणेन सहंतु सहमानः
सन् कोऽसौ कर्ता मुणि मुनिः स्वसंवेदनप्रत्यक्षज्ञानी मणि अविक्षिप्तमनसि सम-भाउ
समभावं सहजशुद्धज्ञानानन्दैकरूपं रागद्वेषमोहरहितं परिणामं कर्मतापन्नं करेइ करोति परिणमति
पुण्णहं पावहं पुण्यस्य पापस्य संबन्धी तेण तेन कारणेन जिय हे जीव संवर-हेउ संवरहेतुः
कारणं
हवेइ भवतीति
अयमत्र तात्पर्यार्थः कर्मोदयवशात् सुखदुःखे जातेऽपि योऽसौ
ഹവേ സുഖ-ദുഃഖനേ സഹന കരതോ മുനി ജേ കാരണേ സമഭാവ കരേ ഛേ തേഥീ തേ കാരണേ തേ
മുനി പുണ്യപാപനാ സംവരനോ ഹേതു ഥായ ഛേ, ഏമ ദര്ശാവേ ഛേ :
ഭാവാര്ഥ:ജേ കാരണേ സുഖ അനേ ദുഃഖ ഏ ബന്നേയനേ സഹന കരതോ മുനി സ്വസംവേദനവാളാ
പ്രത്യക്ഷജ്ഞാനീ-അവിക്ഷിപ്ത (ശാംത) മനമാം സമഭാവനേ-സഹജ ശുദ്ധ ജ്ഞാനാനംദ ജ ജേനും ഏക രൂപ ഛേ ഏവാ,
आगे जो मुनिराज सुख-दुःखको सहते हुए समभाव रखते हैं, अर्थात् सुखमें तो हर्ष
नहीं करते, और दुःखमें खेद नहीं करते, जिनके सुख्-दुःख दोनों ही समान हैं, वे ही साधु
पुण्यकर्म-पापकर्मके संवर (रोकने) के कारण हैं, आनेवाले कर्मोंको रोकते हैं, ऐसा दिखलाते
हैं
गाथा३७
अन्वयार्थ :[येन ] जिस कारण [द्वे अपि सहमानः ] सुख दुःख दोनोंको ही सहता
हुआ [मुनिः ] स्वसंवेदन प्रत्यक्षज्ञानी [मनसि ] निश्चित मनमें [समभावं ] समभावोंको
[करोति ] धारण करता है, अर्थात् राग, द्वेष, मोह रहित स्वाभाविक शुद्ध ज्ञानानंदस्वरूप परिणमन
करता है, विभावरूप नहीं परिणमता, [तेन ] इसी कारण [जीव ] हे जीव, वह मुनि [पुण्यस्य
पापस्य संवरहेतुः ] सहजमें ही पुण्य और पाप इन दोनोंके संवरका कारण [भवति ] होता है
भावार्थ :कर्मके उदयसे सुख-दुःख उत्पन्न होने पर भी जो मुनीश्वर रागादि रहित