Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (Malayalam transliteration).

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Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ശ്രീ ദിഗംബര ജൈന സ്വാധ്യായമംദിര ട്രസ്ട, സോനഗഢ - ൩൬൪൨൫൦
वृत्तिनिवृत्त्योः परममुनिः द्वेषमपि करोति न रागम्
बन्धस्य हेतुः विज्ञातः एतयोः येन स्वभावः ।।५२।।
वित्तिणिवित्तिहिं इत्यादि वित्ति-णिवित्तिहिं वृत्तिनिवृत्तिविषये व्रताव्रतविषये परम-मुणि
परममुनिः देसु वि करइ ण राउ द्वेषमपि न करोति न च रागम् येन किं कृतम् बंधहं
हेउ वियाणियउ बन्धस्य हेतुर्विज्ञातः कोऽसौ एयहं जेण सहाउ एतयोर्व्रताव्रतयोः स्वभावो
येन विज्ञात इति अथवा पाठान्तरम् ‘‘भिण्णउ जेण वियाणियउ एयहं अप्पसहाउ’’ भिन्नो
येन विज्ञानः कोऽसौ आत्मस्वभावः काभ्याम् एताभ्यां व्रताव्रतविकल्पाभ्यां सकाशादिति
तथाहि येन व्रताव्रतविकल्पौ पुण्यपापबन्धकारणभूतौ विज्ञातौ स शुद्धात्मनि स्थितः सन्
व्रतविषये रागं न करोति तथा चाव्रतविषये द्वेषं न करोतीति अत्राह प्रभाकरभट्टः हे भगवन्
ഭാവാര്ഥ:വ്രത-അവ്രതനാ വികല്പോ (അനുക്രമേ) പുണ്യബംധ അനേ പാപബംധനാ കാരണ ഛേ, ഏമ
ജേണേ ജാണ്യും ഛേ തേ ശുദ്ധ ആത്മാമാം സ്ഥിത ഥയോ ഥകോ വ്രതനാ വിഷയമാം രാഗ കരതോ നഥീ അനേ അവ്രതനാ
വിഷയമാം ദ്വേഷ കരതോ നഥീ.
ഏവും കഥന സാംഭളീനേ അഹീം പ്രഭാകരഭട്ട പ്രശ്ന പൂഛേ ഛേ കേ ഹേ ഭഗവാന! ജോ വ്രത ഉപര
രാഗനും താത്പര്യ (രാഗ കരവാനും പ്രയോജന) നഥീ (ജോ വ്രത ഉപര പണ രാഗ കരവാ യോഗ്യ നഥീ) തോ
വ്രതനോ നിഷേധ ഥയോ?
ഭഗവാന് യോഗീന്ദ്രാചാര്യ കഹേ ഛേ കേ വ്രതനോ അര്ഥ ശോ? (സര്വ ശുഭ-അശുഭ ഭാവോഥീ)
അധികാര-൨ : ദോഹാ-൫൨ ]പരമാത്മപ്രകാശ: [ ൩൦൩
गाथा५२
अन्वयार्थ :[परममुनि ] महामुनि [वृत्तिनिवृत्त्योः ] प्रवृत्ति और निवृत्तिमें [रागम्
अपि द्वेषम् ] राग और द्वेषको [न करोति ] नहीं करता, [येन ] जिसने [एतयोः ] इन दोनोंका
[स्वभावः ] स्वभाव [बंधस्य हेतुः ] कर्मबंधका कारण [विज्ञातः ] जान लिया है
भावार्थ :व्रत-अव्रतमें परममुनि राग-द्वेष नहीं करता जिसने इन दोनोंका स्वभाव
बंधका कारण जान लिया है अथवा पाठांतर होनेसे ऐसा अर्थ होता है, कि जिसने आत्माका
स्वभाव भिन्न जान लिया है अपना स्वभाव प्रवृत्ति-निवृत्तिसे रहित है जहाँ व्रत-अव्रतका
विकल्प नहीं है ये व्रत, अव्रत, पुण्य, पापरूप बंधके कारण हैं ऐसा जिसने जान लिया,
वह आत्मामें तल्लीन हुआ व्रत-अव्रतमें राग-द्वेष नहीं करता ऐसा कथन सुनकर प्रभाकरभट्टने
पूछा, हे भगवन्, जो व्रत पर राग नहीं करे, तो व्रत क्यों धारण करे ? ऐसे कथनमें व्रतका निषेध
होता है
तब योगीन्द्राचार्य कहते हैं, कि व्रतका अर्थ यह है, कि सब शुभ-अशुभ भावोंसे निवृत्ति