Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ശ്രീ ദിഗംബര ജൈന സ്വാധ്യായമംദിര ട്രസ്ട, സോനഗഢ - ൩൬൪൨൫൦
അധികാര-൨ : ദോഹാ-൧൯൧ ]പരമാത്മപ്രകാശ: [ ൫൨൧
इति मत्वा तत्साधकत्वेन तदनुकूलं तपश्चरणं करोति तत्परिज्ञानसाधकं च पठति तदा
परंपरया मोक्षसाधकं भवति, नो चेत् पुण्यबन्धकारणं तमेवेति । निर्विकल्पसमाधिरहिताः
सन्तः आत्मरूपं न पश्यन्ति । तथा चोक्त म् — ‘‘आनन्दं ब्रह्मणो रूपं निजदेहे व्यवस्थितम् ।
ध्यानहीना न पश्यन्ति जात्यन्धा इव भास्करम् ।।’’ ।।१९१।।
अथ —
३२३) विषय-कसाय वि णिद्दलिवि जे ण समाहि करंति ।
ते परमप्पहँ जोइया णवि आराहय होंति ।।१९२।।
അഹീം, താത്പര്യ ഏമ ഛേ കേ ജോ നിജ ശുദ്ധ ആത്മാ ജ ഉപാദേയ ഛേ ഏമ ജാണീനേ
തേനാ സാധകപണേ തേനേ അനുകൂള തപശ്ചരണ കരേ ഛേ അനേ തേനാ ജ്ഞാനനാ സാധക ശാസ്ത്രനേ ഭണേ ഛേ
തോ തേ പരംപരാഏ മോക്ഷനും സാധക ഛേ, നഹി തോ തേ (തപശ്ചരണ അനേ ശാസ്ത്രഅധ്യയന) മാത്ര
പുണ്യബംധനും ജ കാരണ ഛേ. ജേഓ നിര്വികല്പ സമാധി രഹിത ഛേ തേ സംതോ ആത്മരൂപനേ ദേഖീ
ശകതാ നഥീ. വളീ കഹ്യും ഛേ കേ
‘‘आनन्दं ब्रह्मणो रूपं निजदेहे व्यवस्थितम् । ध्यानहीना न पश्यन्ति
जात्यन्धा इव भास्करम् ।।’’ അര്ഥ: — ബ്രഹ്മനും രൂപ ആനംദ ഛേ, തേ പോതാനാ ദേഹമാം രഹേലോ ഛേ.
ജേവീ രീതേ ജന്മാംധ പുരുഷോ സൂര്യനേ ദേഖീ ശകതാ നഥീ തേവീ രീതേ ധ്യാനഥീ രഹിത പുരുഷോ തേനേ
ജോഈ ശകതാ നഥീ. ൧൯൧.
വളീ (ഹവേ വിഷയകഷായനോ നിഷേധ കരേ ഛേ) : —
वह परमसमाधिके बिना तप करता हुआ और श्रुत पढ़ता हुआ भी निर्मल ज्ञान दर्शनरूप
तथा इस देहमें बिराजमान ऐसे निज परमात्माको नहीं देख सकता । जो आत्मस्वरूप राग
द्वेष मोह रहित परमशांत है । परमसमाधिके बिना तप और श्रुतसे भी शुद्धात्माको नहीं देख
सकता । जो निज शुद्धात्माको उपादेय जानकर ज्ञानका साधक तप करता है, और ज्ञानकी
प्राप्तिका उपाय जो जैनशास्त्र उनको पढ़ता है, तो परम्परा मोक्षका साधक है । और जो
आत्माके श्रद्धान बिना कायक्लेशरूप तप ही करे, तथा शब्दरूप ही श्रुत पढ़े, तो मोक्षका
कारण नहीं है, पुण्यबंधके कारण होते हैं । ऐसा ही परमानंदस्तोत्रमें कहा है, कि जो
निर्विकल्प समाधि रहित जीव हैं, वे आत्मस्वरूपको नहीं देख सकते । ब्रह्मका रूप आनंद
है, वह ब्रह्म निज देहमें मौजूद है; परंतु ध्यानसे रहित जीव ब्रह्मको नहीं देख सकते, जैसे
जन्मका अंधा सूर्यको नहीं देख सकता है ।।१९१।।
आगे विषय कषायोंका निषेध करते हैं —