Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (Oriya transliteration).

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Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
समयस्तावत्पर्यायः कस्मात् विनश्वरत्वात् तथा चोक्तं समयस्य विनश्वरत्वम्‘‘समओ
उप्पण्णध्वंसी’’ इति स च पर्यायो द्रव्यं विना न भवति कस्य द्रव्यस्य भवतीति विचार्यते
यदि पुद्गलद्रव्यस्य पर्यायो भवति तर्हि पुद्गलपरमाणुपिण्डनिष्पन्नघटादयो यथा मूर्ता भवन्ति तथा
अणोरण्वन्तरव्यतिक्रमणाज्जातः समयः, चक्षुःसंपुटविघटनाज्जातो निमिषः, जलभाजनहस्तादि-
व्यापाराज्जाता घटिका, आदित्यबिम्बदर्शनाज्जातो दिवसः, इत्यादि कालपर्याया मूर्ता दृष्टिविषयाः
प्राग्भवन्ति
कस्मात् पुद्गलद्रव्योपादानकारणजातत्वाद् घटादिवत् इति तथा चोक्त म्
उपादानकारणसदृशं कार्यं भवति मृत्पिण्डाद्युपादानकारणजनितघटादिवदेव न च तथा
समयनिमिषघटिकादिवसादिकालपर्याया मूर्ता दृश्यन्ते
यैः पुनः पुद्गलपरमाणुमन्दगतिगमन-
श्रीपंचास्तिकायमें कहा है ‘‘समओ उप्पण्णपद्धंसी’’ अर्थात् समय उत्पन्न होता है और नाश होता
है
इससे जानते हैं कि समय पर्याय द्रव्यके बिना हो नहीं सकता किस द्रव्यका पर्याय है,
इस पर अब विचार करना चाहिये यदि पुद्गलद्रव्यकी पर्याय मानी जावे, तो जैसे पुद्गल
परमाणुओंसे उत्पन्न हुए घटादि मूर्तीक हैं, वैसे समय भी मूर्तीक होना चाहिये, परंतु समय
अमूर्तीक है, इसलिये पुद्गलकी पर्याय तो नहीं है
पुद्गलपरमाणु आकाशके एक प्रदेशसे दूसरे
प्रदेशको जब गमन होता है, सो समयपर्याय कालकी है, पुद्गलपरमाणुके निमित्तसे होती हैं,
नेत्रोंका मिलना तथा विघटना उससे निमेष होता है, जलपात्र तथा हस्तादिके व्यापारसे घटिका
होती है, और सूर्यबिम्बके उदयसे दिन होता है, इत्यादि कालकी पर्याय हैं, पुद्गलद्रव्यके
निमित्तसे होती हैं, पुद्गल इन पर्यायोंका मूलकारण नहीं है, मूलकारण काल है
जो पुद्गल
मूलकारण होता तो समयादिक मूर्तीक होते जैसे मूर्तीक मिट्टीके ढेलेसे उत्पन्न घड़े वगैर मूर्तीक
ଵିନଶ୍ଵରପଣୁଂ କହ୍ଯୁଂ ଛେ ‘समओ उप्पणध्वंसी’ (ଅର୍ଥ:ସମଯ ‘ଉତ୍ପନ୍ନଧ୍ଵଂସୀ ଛେସମଯ ଉତ୍ପନ୍ନ ଥାଯ
ଛେ ଅନେ ନାଶ ପାମେ ଛେ.)
ଵଳୀ, ତେ ପର୍ଯାଯ ଦ୍ରଵ୍ଯ ଵିନା ହୋତୋ ନଥୀ. ତୋ ହଵେ ସମଯ କଯା ଦ୍ରଵ୍ଯନୋ ପର୍ଯାଯ ଛେ ତେ ଵିଚାରୀଏ.
ଜୋ ସମଯ ପୁଦ୍ଗଲଦ୍ରଵ୍ଯନୋ ପର୍ଯାଯ ହୋଯ ତୋ ପୁଦ୍ଗଲପରମାଣୁପିଂଡଥୀ ବନେଲ ଘଟାଦି ଜେଵୀ ରୀତେ ମୂର୍ତ ହୋଯ
ଛେ ତେଵୀ ରୀତେ ଏକ ପ୍ରଦେଶଥୀ ବୀଜା ପ୍ରଦେଶ ସୁଧୀ ପରମାଣୁନା ଗମନଥୀ ଉତ୍ପନ୍ନ ଥତୋ ସମଯ, ଆଂଖନା
ବୀଡଵା-ଉଘଡଵାଥୀ ଉତ୍ପନ୍ନ ଥତୋ ନିମିଷ, ଜଲଭାଜନ ଅନେ ହସ୍ତାଦି ଵ୍ଯାପାରଥୀ ଉତ୍ପନ୍ନ ଥତୀ ଘଡୀ,
ସୂର୍ଯନା ବିଂବନା ଉଦଯଥୀ ଉତ୍ପନ୍ନ ଥତୋ ଦିଵସ ଇତ୍ଯାଦି କାଳପର୍ଯାଯୋ ମୂର୍ତ ହୋଵା ଜୋଈଏ, ଅନେ ମୂର୍ତ
ହୋଵାଥୀ ଦ୍ରଷ୍ଟିନା ଵିଷଯ ଥଵା ଜୋଈଏ, କାରଣ କେ ତେଓ ପୁଦ୍ଗଲଦ୍ରଵ୍ଯନା ଉପାଦାନ କାରଣଥୀ ଉତ୍ପନ୍ନ
ଥଯେଲା ମାନ୍ଯା ଛେ. ଵଳୀ କହ୍ଯୁଂ ଛେ କେ
‘उपादानकारणसदृशं कार्यं भवति’ ଉପାଦାନ କାରଣନା ଜେଵୁଂ ଜ କାର୍ଯ
ଥାଯ ଛେ. ଜେଵୀ ରୀତେ ମାଟୀନା ପିଂଡାଦି ଉପାଦାନ କାରଣ ଜେଵୁଂ ଘଟାଦି କାର୍ଯ ମୂର୍ତ ଥାଯ ଛେ, ପଣ ତେ ପ୍ରମାଣେ
ସମଯ, ନିମିଷ, ଘଡୀ, ଦିଵସ ଆଦି କାଳପର୍ଯାଯୋ ମୂର୍ତ ଜୋଵାମାଂ ଆଵତା ନଥୀ.
ଅଧିକାର-୨ : ଦୋହା-୨୧ ]ପରମାତ୍ମପ୍ରକାଶ: [ ୨୩୯