Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (Oriya transliteration). Gatha-173 (Adhikar 2).

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Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
ଅଧିକାର-୨ : ଦୋହା-୧୭୨ ]ପରମାତ୍ମପ୍ରକାଶ: [ ୪୯୭
सव्वहिं इत्यादि झाहि ध्याय चिन्तय तुहुँ त्वं हे प्रभाकरभट्ट कम् अप्पा
स्वशुद्धात्मानम् कथंभूतम् देउ वीतरागपरमानन्दसुखेन दीव्यति क्रीडति इति देवस्तं देवम्
पुनरपि कथंभूतम् अणंतु केवलज्ञानाद्यनन्तगुणाधारत्वादनन्तसुखास्पदत्वादविनश्वरत्वाच्चानन्त-
स्तमनन्तम् किं कृत्वा पूर्वम् चित्तु णिवारिवि चित्तं निवार्य व्यावृत्य किं कुर्वन् सन् जंत
गच्छत्परिणममानं सत् कैः करणभूतैः सव्वहिं रायहिं वीतरागात्स्वशुद्धात्मद्रव्याद्विलक्षणैः
सर्वशुभाशुभरागैः न केवलं रागैः छहिं रसहिं रसरहिताद्वीतरागसदानन्दैकरसपरिणतादात्मनो
विपरीतैः गुडलवणदधिदुग्धतैलघृतषड्रसैः पुनरपि कैः पंचहिं रूवहिं अरूपात्
शुद्धात्मतत्त्वात्प्रतिपक्षभूतैः कृष्णनीलरक्त श्वेतपीतपञ्चरूपैरिति तात्पर्यम् १७२
अथ येन स्वरूपेण चिन्त्यते परमात्मा तेनैव परिणमतीति निश्चिनोति
३०४) जेण सरूविं झाइयइ अप्पा एहु अणंतु
तेण सरूविं परिणवइ जह फ लिहउ-मणि मंतु ।।१७३।।
ଭାଵାର୍ଥ :ଵୀତରାଗ ସ୍ଵଶୁଦ୍ଧାତ୍ମଦ୍ରଵ୍ଯଥୀ ଵିଲକ୍ଷଣ ଏଵା ଶୁଭାଶୁଭ ସର୍ଵ ରାଗୋଥୀ ରସ
ରହିତ ଏକ (କେଵଳ) ଵୀତରାଗ ସଦାନଂଦରୂପ ରସମାଂ ପରିଣତ ଆତ୍ମାଥୀ ଵିପରୀତ, ଗୋଳ, ଲଵଣ,
ଦୂଧ, ଦହୀଂ, ଘୀ ଅନେ ତେଲ ଏ ଛ ରସୋଥୀ ଅନେ ରୂପ ରହିତ ଏଵା ଶୁଦ୍ଧାତ୍ମତତ୍ତ୍ଵଥୀ ପ୍ରତିପକ୍ଷଭୂତ
କାଳା, ନୀଲ, ରାତା, ସଫେଦ, ପୀଳା ଏ ପାଂଚ ରୂପୋଥୀ ପରିଣମତା ମନନେ ରୋକୀନେ, କେଵଳଜ୍ଞାନାଦି
ଅନଂତଗୁଣନୋ ଆଧାର ହୋଵାଥୀ, ଅନଂତସୁଖନୁଂ ସ୍ଥାନ ହୋଵାଥୀ ଅନେ ଅଵିନଶ୍ଵର ହୋଵାଥୀ ଅନଂତ ଛେ
ଏଵା, ଵୀତରାଗ ପରମାନଂଦରୂପ ସୁଖଥୀ ଜେ ଶୋଭେ ଛେ, ରମେ ଛେ, ତେ ଦେଵ ଛେ, ଏଵା ସ୍ଵଶୁଦ୍ଧାତ୍ମାନେ ହେ
ପ୍ରଭାକରଭଟ୍ଟ! ତୁଂ ଧ୍ଯାଵ-ଚିନ୍ତଵନ କର. ୧୭୨.
ହଵେ, ପରମାତ୍ମା ଜେ ସ୍ଵରୂପେ ଚିଂତଵଵାମାଂ ଆଵେ ଛେ ତେ ଜ ସ୍ଵରୂପେ ତେ ପରିଣମେ ଛେ, ଏମ
ନକ୍କୀ କରେ ଛେ :
भावार्थ :वीतराग, परम आनंद सुखमें क्रीड़ा करनेवाले केवल ज्ञानादि अनंतगुणवाले
अविनाशी शुद्ध आत्माका एकाग्र चित्त होकर ध्यान कर क्या करके ? वीतराग शुद्धात्मद्रव्यसे
विमुख जो समस्त शुभाशुभ राग, निजरससे विपरीत जो दधि, दुग्ध, तेल, घी, लोंन, मिस्री, ये छह
रस और जो अरूप शुद्धात्मद्रव्यसे भिन्न काले, सफे द, पीले, लाल, पाँच तरहके रूप इनमें निरन्तर
चित्त जाता है, उसको रोककर आत्मदेवकी आराधना कर
।।१७२।।
आगे आत्माको जिसरूपसे ध्यावो, उसीरूप परिणमता है, जैसे स्फ टिकमणिके नीचे
जैसा डंक दिया जाये, वैसा ही रंग भासता है, ऐसा कहते हैं