Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
ଅଧିକାର-୨ : ଦୋହା-୧୭୪ ]ପରମାତ୍ମପ୍ରକାଶ: [ ୪୯୯
श्लोकार्थकथितद्रष्टान्तेन ध्यातव्यः । इदमत्र तात्पर्यम् । अयमात्मा येन येन स्वरूपेण चिन्त्यते
तेन तेन परिणमतीति ज्ञात्वा शुद्धात्मपदप्राप्त्यर्थिभिः समस्तरागादिविकल्पसमूहं त्यक्त्वा
शुद्धरूपेणैव ध्यातव्य इति ।।१७३।।
अथ चतुष्पादिकां कथयति —
३०५) एहु जु अप्पा सो परमप्पा कम्म-विसेसेँ जायउ जप्पा ।
जामइँ जाणइ अप्पें अप्पा तामइँ सो जि देउ परमप्पा ।।१७४।।
एष यः आत्मा स परमात्मा कर्मविशेषेण जातः जाप्यः ।
यदा जानाति आत्मना आत्मानं तदा स एव देवः परमात्मा ।।१७४।।
ଏ ଶ୍ଲୋକାର୍ଥମାଂ କହେଲା ଦ୍ରଷ୍ଟାଂତଥୀ (ଆତ୍ମା) ଧ୍ଯାଵଵା ଯୋଗ୍ଯ ଛେ (ଚିଂତଵଵା ଯୋଗ୍ଯ ଛେ).
ଅହୀଂ, ତାତ୍ପର୍ଯ ଏମ ଛେ କେ ଆ ଆତ୍ମା ଜେ ଜେ ସ୍ଵରୂପେ ଚିଂତଵଵାମାଂ ଆଵେ ଛେ ତେ ତେ ସ୍ଵରୂପେ
ପରିଣମେ ଛେ ଏମ ଜାଣୀନେ ଶୁଦ୍ଧଆତ୍ମପଦନୀ ପ୍ରାପ୍ତିନା ଅର୍ଥୀଏ ସମସ୍ତ ରାଗାଦି ଵିକଲ୍ପନା ସମୂହନେ
ଛୋଡୀନେ (ଆତ୍ମାନେ) ଶୁଦ୍ଧରୂପେ ଜ ଧ୍ଯାଵଵୋ ଜୋଈଏ. ୧୭୩.
ହଵେ, ଚତୁଷ୍ପଦୋନୁଂ କଥନ କରେ ଛେ : — (ହଵେ ଚାର ସୂତ୍ରୋ କହେ ଛେ) : —
भासता है, जिससे कि सर्प डर जाता है । ऐसा ही कथन अन्य ग्रंथोंमें भी कहा है, कि जिस
जिस रूपसे आत्मा परिणमता है, उस उस रूपसे आत्मा तन्मयी हो जाता है, जैसे स्फ टिकमणि
उज्ज्वल है, उसके नीचे जैसा डंक लगाओ, वैसा ही भासता है । ऐसा जानकर आत्माका स्वरूप
जानना चाहिये । जो शुद्धात्मपदकी प्राप्तिके चाहनेवाले हैं, उनको यही योग्य है, कि समस्त
रागादिक विकल्पोंके समूहको छोड़कर आत्माके शुद्ध रूपको ध्यावें और विकारों पर दृष्टि न
रक्खें ।।१७३।।
आगे चतुष्पदछंदमें आत्माके शुद्ध स्वरूपको कहते हैं —
गाथा – १७४
अन्वयार्थ : — [एष यः आत्मा ] यह प्रत्यक्षीभूत स्वसंवेदनज्ञानकर प्रत्यक्ष जो आत्मा
[स परमात्मा ] वही शुद्धनिश्चयनयकर अनंत चतुष्टयस्वरूप क्षुधादि अठारह दोष रहित निर्दोष
परमात्मा है, वह व्यवहारनयकर [कर्मविशेषेण ] अनादि कर्मबंधके विशेषसे [जाप्यः जातः ]
पराधीन हुआ दूसरेका जाप करता है; परंतु [यदा ] जिस समय [आत्मना ] वीतराग निर्विकल्प
स्वसंवेदनज्ञानकर [आत्मानं ] अपनेको [जानाति ] जानता है, [तदा ] उस समय [स एव ]