Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (Oriya transliteration). Gatha-194 (Adhikar 2).

< Previous Page   Next Page >


Page 524 of 565
PDF/HTML Page 538 of 579

background image
Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
୫୨୪ ]ଯୋଗୀନ୍ଦୁଦେଵଵିରଚିତ: [ ଅଧିକାର-୨ : ଦୋହା-୧୯୩
परब्रह्मशब्दवाच्यं निजदेहस्थं केवलज्ञानाद्यनन्तगुणस्वभावं परमात्मस्वरूपम् किं कृत्वा पूर्वम्
परम-समाहि धरेवि वीतरागतात्त्विकचिदानन्दैकानुभूतिरूपं परमसमाधिं धृत्वा ते पूर्वोक्त -
शुद्धात्मभावनारहिताः पुरुषाः
सहंति सहन्ते
कानि कर्मतापन्नानि भव-दुक्खइं वीतराग-
परमाह्लादरूपात् पारमार्थिकसुखात् प्रतिपक्षभूतानि नरनारकादिभवदुःखानि कतिसंख्योपेतानि
बहुविहइं शारीरमानसादिभेदेन बहुविधानि कियन्तं कालम् कालु अणंतु अनन्तकाल-
पर्यन्तमिति अत्रेदं व्याख्यानं ज्ञात्वा निजशुद्धात्मनि स्थित्वा रागद्वेषादिसमस्तविभावत्यागेन
भावना कर्तव्येति तात्पर्यम् ।।१९३।।
अथ
३२५) जामु सुहासुह-भावडा णवि सयल वि तुट्टंति
परमसमाहि ण तामुमणि केवलि एहु भणंति ।।१९४।।
ପରମସମାଧିନେ ଧାରଣ କରୀନେ ପରମ ବ୍ରହ୍ମନେ-‘ପରବ୍ରହ୍ମ’ ଶବ୍ଦଥୀ ଵାଚ୍ଯ ଏଵା, ନିଜଦେହମାଂ ରହେଲା,
କେଵଳଜ୍ଞାନାଦି ଅନଂତଗୁଣସ୍ଵଭାଵଵାଳା ପରମାତ୍ମସ୍ଵରୂପନେ-ପାମତା ନଥୀ (ଜାଣତା ନଥୀ) ତେଓ
ପୂର୍ଵୋକ୍ତ ଶୁଦ୍ଧ ଆତ୍ମାନୀ ଭାଵନାଥୀ ରହିତ ପୁରୁଷୋ-ଵୀତରାଗ ପରମ ଆହ୍ଲାଦରୂପ ପାରମାର୍ଥିକ
ସୁଖଥୀ ପ୍ରତିପକ୍ଷଭୂତ, ଶାରୀରିକ, ମାନସିକ ଆଦି ଅନେକ ପ୍ରକାରନାଂ ଭଵଦୁଃଖୋନେ ସହେ ଛେ.
ଅହୀଂ, ଆ ଵ୍ଯାଖ୍ଯାନ ଜାଣୀନେ ନିଜ ଶୁଦ୍ଧ ଆତ୍ମାମାଂ ସ୍ଥିତ ଥଈନେ ରାଗଦ୍ଵେଷାଦି ସମସ୍ତ
ଵିଭାଵନା ତ୍ଯାଗ ଵଡେ (ଆତ୍ମ) ଭାଵନା କରଵୀ ଜୋଈଏ, ଏଵୁଂ ତାତ୍ପର୍ଯ ଛେ. ୧୯୩.
ଵଳୀ (ହଵେ ଏମ କହେ ଛେ କେ ଜ୍ଯାଂ ସୁଧୀ ଆ ଜୀଵନା ବଧା ଶୁଭାଶୁଭ ଭାଵୋ ଦୂର
ନ ଥାଯ ତ୍ଯାଂ ସୁଧୀ ପରମସମାଧି ଥଈ ଶକତୀ ନଥୀ.) :
हैं, नाना प्रकारके दुःखोंको अज्ञानी जीव भोगता है ये दुःख वीतराग परम आह्लादरूप जो
पारमार्थिकसुख उससे विमुख हैं यह जीव अनन्तकाल तक निजस्वरूपके ज्ञान बिना
चारों गतियोंके नाना प्रकारके दुःख भोग रहा है ऐसा व्याख्यान जानकर निज शुद्धात्ममें
स्थिर होके राग द्वेषादि समस्त विभावोंका त्यागकर निज स्वरूपकी ही भावना करनी
चाहिये
।।१९३।।
आगे यह कहते हैं, कि जब तक इस जीवके शुभाशुभ भाव सब दूर न हों, तब तक
परमसमाधि नहीं हो सकती